मुक्तांकुर भाग–2

रकमिश सुल्तानपुरी द्वारा रचित पुस्तक मुक्तांकुर के समस्त मुक्तक ::–


1-

राम  सदा  सच  के  प्रतिमूर्ति  असत्य   दशानन  दम्भ  दिखाता । 
दुष्ट  सशंकित  क्षुब्ध  हुआ समझे निज को  वह  भाग्य विधाता । 
क्रोध  भरा   अभिमान    करे  हठ, क्रूर   निरंकुश   वैर   रचाता ।
ध्वस्त घमण्ड हुआ क्षण में जब  सत्य  असत्य पे  वाण  चलाता ।

2-

सत्य  सदा  बलवान  रहा  पर  झूठ   अनीति  लिये  मदमाता ।
रूप  अनेक  असत्य धरे  खल  हार न मानत जाल  बिछाता । 
क्रोध का बोध न द्वेष का भान, कुकर्म किये पुनि न पछताता । 
नित्य  कलंकित  मार्ग  चुने निज  कर्म  सुकर्म  सदा  ठहराता । 

3-

सत्य खड़ा  नित पाहन सा ,बलहीन असत्य को धूल चटाता ।
है दिनमान समान  सदा सच  ज्ञान  प्रकाशित  मार्ग दिखाता ।
पारस पत्थर  सा  गुणवान  महान,  कलंक  प्रभाव  मिटाता । 
दुर्जन को  कड़वा  लगता  पर सज्जन का सच मान बढ़ाता ।

4-

पाप   बराबर  झूठ  सदा,  छल -छद्म  भरे उर  सूल  चुभाये । 
क्लेश प्रभाव विक्षिप्त  करे मन,  तामस  से तन रोग समाये ।
कुंठित भाव विचार, अमंगल कर्म , विकेक को नित्य सुझाये । 
'राम' मृषा सम दोष नही, सुख,जीवन ,जीव समूल मिटाये । 

5-

हार  निरादर  नित्य   मिले, खल  झूठ   कलंकित   रूप  छिपाये । 
प्रीति ,सुनीति बिना छल के, सित सत्य असत्य को जीत दिखाये । 
द्वंद्व  मृषा  सच   मघ्य  निरन्तर  व्याप्त  रहे   जग  धूम   मचाये । 
जीत रहा  नित  सत्य सदा शुभ, पावन,  पुण्य  का  भान  कराये । 

6

     लिखो नवगीत गुंजित मन भरो कुछ भाव  जीवन मे ।
     कि जिससे हो मनुजता  का पुनः  उद्भाव  जीवन  मे ।
     खिले  वो अंकुरित  पौधा  दिशा  निर्देशिका  बनकर -
     बहे सुख दुख के' आँसू बन सदा समभाव जीवन मे । 

7

    हवा   है,  धूप,  वर्षा, तम ,नदी , झरने  ,वही  सागर ।
    वही जलचर, वही थलचर, तलातल मे  वही  नभचर ।
    ख़ुदा  है  वो  बसा  मुझमे,  बसा  तुझमे,  चराचर  मे -
    मिला हर गाँव ,गुरु मन्दिर, शिवालय मे उसी का घर ।

8

तोड़ विषमताएं धर्मों की गान  करेगे  होली  मे ।
अंग अंग  बदरंग  करेगे  मान  करेगे  होली  मे ।
ले यारों को भंग  संग  हुड़दंग  शरारा  होना है ।
प्रेम का रंग लगाकर के सम्मान करेगे होली मे ।

9

हृदय की ख़ुशबू थी रकमिश चम्पा और चमेली थी ।
चन्द्र रश्मियों सी मुस्काने  मन की वो अलबेला थी ।
आज छोड़कर मुझे जा रही  तन्हाई के  आँगन  मे ।
कल ही रंग अबीरों के सँग  जिसने होली खेली थी । 

10

     हवा पश्चिमी ऐसी बरपी लग सकता  अनुमान  नही ।
     नर नारी सब युवा वृद्ध मे सदगुण का अवधान नही ।
     बदल चुका परिवेष देश का किसे कहोगे  दोषी  है-
     तन मन से अब भारतीयता की  होती पहचान नही ।     

11

    छोड़ प्रथाएँ हम भारत की करने लगे गुलामी फिर ।
     शिष्टाचार छोड़ कर नफ़रत बीज बो रहें नामी फिर ।
     अपने ही घर गाँव देश का पतन देख ख़ुश हो जाते-
     किन्तु गैर देषों के भाते  किस्से और  कहानी  फिर ।

 12

    हवा   है   धूप  वर्षा   तम  नदी  झरना  वही  सागर ।
    वही जलचर वही थलचर तलातल मे  वही  नभचर ।
    ख़ुदा  है  वो  बसा  मुझमे  बसा  तुझमे  चराचर  मे -
    मिला हर गाँव गुरु मन्दिर शिवालय मे उसी का घर ।

13

कर्ज़दार हुंकार मुझी पर , धनवानों  से तो  डरती  हो ।
नये दलालों नेताओं सी चाल दोगली  तुम  चलती हो ।
बदल रहा हूँ पथ जीवन के चौराहों से  पगडण्डी तक -
अरे ग़रीबी! आज बता  दे  क्यों मेरा पीछा करती हो ।

                                
14

भौतिकता के जटिल भवँर मे अंधा बनके मत  फस जाना ।
जीवन  है  अनमोल रास्तों  पर  चलकर  मंजिल  है  पाना ।
सम्बन्धो  के फूलों  मे नित अपने  पन  की  ख़ुशबू भरकर-
अब ख़्वाबों से निकल असल मे बुनकर देखो ताना-बाना ।

15

है जीवन जीव बने निज मे,  कुसुमादि  मे अमृत   लसते   है ।
शशि, भानु समेत अगण्य सदा ,परभात किरण सँग हँसते है ।
जगदीश  चराचर   रूप  धरे , पर भान  नही   तुमको   कैसे ।
जो दृश्य अदृश्य रमे  कण कण, श्रीराम हृदय मम  बसते  है ।

16

जड़ जंगम संगम स्वांस  बसे ,धर  रूप  अदृश्य  सनातन  है ।  
कलि काल अकाल सकाल सदा पर आदि अनादि पुरातन है ।
मन-हाथ चरण धन-ध्यान  लगा, श्रीराम  हृदय तट मे बिहरें ।
बिन स्वार्थ बढ़ो तज भौतिकता,बड़ भाग्य सुभाग मिलातन है ।

17

    मिलन का आ गया अपने पुनः त्योहार आँगन मे ।
    मिटा नफ़रत गले मिलकर करेंगें  प्यार आँगन मे ।
    न कुंठित मन मगन उर मे  कहीं  दुर्भावना  पनपे ।
    भरेंगें  रंग  खुशियों का  सभी  के  द्वार आँगन मे ।

                        
18

आप   जाओगे   चले  तो  मयकदा  रह  जाएगा ।
अश्क़   से  भींगा  हुआ  ये  आइना  रह  जाएगा ।
अश्क़  की  बौछार  होगी  जब  तेरी  तस्वीर  पर ।
काँच के टुकड़ों के दरम्यां दिल पड़ा रह जाएगा

19

आज  धरा  पर  फ़ैल   रहा   क्यों  हृदय  में  प्रदूषण है ।
हरियाली  बन  बाग़  बगीचों   तक   कैसा ये  शोषण है ।
इन्हें   बचना  हे  नर   दानव  वृक्षो  की  रखवाली   कर ।
खग पंछी द्विज विहग नभो तक प्रकृति के आभूषण है ।

                             

20

इक घरौंदा प्यार का बेशक़ बना आये हो तुम ।
आग सच की वाकई मे जो लगा आये हो तुम ।
बुझ गया होगा यक़ीनन  ज़लज़ले  तूफ़ान  मे ।
एक दीया जो अँधेरे  मे  जला  आये  हो  तुम ।

                               रकमिश सुल्तानपुरी 
                     आगे मुक्तक भाग 2 में पढ़े –

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें