51- 🌷इक न इक दिन है ढह जाना🌷
आश्वासन इस हृदय को देता हूँ हर बार
अनदेखा कर छिपा रह गया हुआ नही तैयार
जिम्मेदारी
चाह रही है
दस्तक देकर अंदर आना ।
इक न इक दिन है ढह जाना ।।1
झांक रही है दरवाज़े पर आने का प्रयास
मैं ही रूप बदलकर खुद को देता हूँ विश्वास
और दूर
जाने से इससे
खोज रहा हूँ एक बहाना ।
इक न इक दिन है ढह जाना ।।2
झूठा सब है ,झूठ बनाना ,झूठा यह अधिकार
उसी झूठ का एक आवरण करता है उद्गार
परन्तु कहाँ तक
सच्चे उर को
झूठे मन से है बहलाना ।
इक न इक दिन है ढह जाना ।।3
धीरे-धीरे दबा जा रहा प्रकृति से मजबूर
दृढ़ निश्चय कर सम्हल रहा हूँ साहस से भरपूर
परन्तु रास्ते
ऊबड़-खाबड़
चलते चलते है थक जाना ।
इक न इक दिन है ढह जाना ।।4
तिनका तिनके ,बड़े छोट सब ,स्थिति के अनुसार
टोक रहे है दिनचर्या में आकर बारम्बार
अहसासों को
भाग्य भरोसे
आखिर कब तक है टरकाना ।
इक न इक दिन है ढह जाना ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
52- 🌷आज मुझको क्या मिला है🌷
जो कभी असहाय आशा से विमुख थे
सिर्फ धन का ही नही अन्यान्य दुःख थे
अवलम्बन
दे दिया क्या
दुःख कुसुम बनकर खिला है ।
आज मुझको क्या मिला है ।।1
अस्तित्व जिनका था नही संसार मे
अंकुरित करता रहा उपकार मे
विध रहा है
अब हृदय
सुदृढ़ कंटक काफ़िला है ।
आज मुझको क्या मिला है ।।2
था पारखी परस्वार्थ में होश किसको
सत्कर्मो के लिये दें दोष किसको
क्या पता
अमृत वही
विष बनकर अब जिला है ।
आज मुझको क्या मिला है ।।3
कौन अब किसपर भरोसा कर सकेगा
खुद ही दुःखों का महल वह गढ़ सकेगा
पुष्प बोया
था परंतु
बन गया दुःख का किला है ।
आज मुझको क्या मिला है ।।4
मिल सका दुर्भाग्य अपने आप को
शेष सब कुछ रह गया सन्ताप को
कर्तव्य वह
अतीत का
प्रायश्चित बन झिलमिला है ।
आज मुझको क्या मिला है ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
53- 🌷आज तुम अपने लिए ही🌷
है उमस भरपूर तो बरसात होगी
है उजाला पर कभी तो रात होगी
पर वहाँ भी
सत्य के प्रति
कर्तव्य अपना देखिये ही ।
आज तुम अपने लिए ही ।।1
हैं तुम्हारे मन के जो आवेश कुंठित
रोक दो इनको करो अनिवार्य दण्डित
मोड़ दो
आशा के पथ पर
प्रयास करके भेजिये ही ।
आज तुम अपने लिए ही ।।2
स्वार्थ कोई भी नही अवरोध होगा
हाँ ,पराये के लिये दुर्बोध होगा
किन्तु पहले
और के प्रति
तुम स्वयं को फेकिये ही ।
आज तुम अपने लिए ही ।।3
मत मिलने दो किसी को भी सफलता
जो तुम्हारे श्रेय से भरपूर पलता
पग तुम्हारे
कँप रहें जो
अन्यत्र ही पर टेकिये ही ।
आज तुम अपने लिए ही ।।4
खोज लो इक रास्ता सम्मान का
सामर्थ्य है ,तुम रूप हो इंसान का
कम से कम
सत्य के प्रति
मिथ्या वचन पर टोकिये ही ।
आज तुम अपने लिए ही ।। 5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
54- 🌷प्रेम ही सब कुछ नही है🌷
भाव की सरिता मे जो भी बह चला है
आकर्षण मे हृदय भी ढह पड़ा है
पर वही
ठहराव है
मान लो बातें सही है ।
प्रेम ही सब कुछ नही है ।।1
हैं तुम्हारे और भी कर्तव्य पथ
खोल आँखें छोड़ दो यह प्रेम पथ
तुम नही
वर्षो पुरानी
बात सच्ची ही कही है ।
प्रेम ही सब कुछ नही है ।।2
प्रेम मे शांति की छाया नही रहती
शून्य हृदय और आंखें क्या नही सहती
निष्क्रियता
के समर्थन पर
जीत हृदय की रही है ।
प्रेम ही सब कुछ नही है ।।3
है बड़े खतरे तुफानी दिल्लगी मे
है ख़ुसी में भी यहां गम जिंदगी मे
कर्म के प्रति
त्याग से ही
प्रेम की गंगा बही है ।
प्रेम ही सब कुछ नही है ।।4
जो नियत है लक्ष्य वह पाना पड़ेगा
वास्तविकता के लिये जाना पड़ेगा
सत्य बातें
सार्थक ये
तर्को से भी अनकही है ।
प्रेम ही सब कुछ नही है ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
55- 🌷फिर मिट गया झरोखा🌷
होता रहता रह रह करके हृदय में उद्गार
ठहर गया है चित्र तुम्हारा स्मृति के उस पार
तटबन्धों से
आती जाती
आहट का कौन भरोसा ।
फिर मिट गया झरोखा ।।1
छा जाता बन रूप दूसरा आँखों के आँचल मे
जैसे कि अधखिला इंदु विस्तीर्ण हो गया जल मे
क्षणभर मन को
आकर्षित कर
झिलमिल रूप अनोखा ।
फिर मिट गया झरोखा ।।2
पतझङ मे शुष्क हवाएं जब होती है प्रारब्ध
तब पर्णो के सम्पुट से गूंजा करते है दो शब्द
साँसों के
वे है संदेसे
अधरों ने जिसे परोसा ।
फिर मिट गया झरोखा ।।3
फिर फ़ूलों पर तितली सी मिली एक परछायी
वह सूखी पंखुड़ी एक थी अवलम्बित मुरझायी
आहत मन ने
कुशल नयन को
बहुत देर तक कोसा ।
फिर मिट गया झरोखा ।।4
सावन में बढ़ते है रुक रुक के घटाओ के पग
आँखों से इक बूंद झरी क्या भींग गया सारा जग
धूमिल धूमिल
है तस्वीरे
हृदय दे रहा धोख़ा ।
फिर मिट गया झरोखा ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
56- यह अंतिम संघर्ष नही है
प्रथम सफलता पा जीवन की करना तुमको हर्ष नही है ।
यह अंतिम संघर्ष नही है ।।1
लक्ष्य के अनुराग का
धैर्य बनकर त्याग का
खिल जाने फ़ो नवांकुर सा करना कोई तर्क नही है ।
यह अंतिम संघर्ष नही है ।।2
सुदृड़ स्वाभिमान से
पंथ के अनुमान से
प्रयास को विस्तीर्ण कर वैकल्पिक विमर्श नही है ।
यह अंतिम संघर्ष नही है ।।3
सफलता के सानिध्य में
हार या प्रसिद्धि में
ठहराव की प्रवृति रखना वीरोचित निष्कर्ष नही है ।
यह अंतिम संघर्ष नही है ।।4
कामना जिसकी सुखों की
भावना दुःखमय उसी की
बिना त्याग का किये सहारा जीवन का उत्कर्ष नही है ।
यह अंतिम संघर्ष नही है ।।5
शुयश औए स्नेह का
देश के प्रति देह का
औचित्य है , जीवन का मृत्यु तो आदर्श नही है ।
यह अंतिम संघर्ष नही है ।।6
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
57- .स्नेहों के क्षण में
वातावरण मे
फैला रहता
आकर्षण कण-कण में ।
स्नेहों के क्षण में ।।1
भाँप जाते भाव की चढ़ती उतरती वो लहर
खिल रहे होते सुमन से स्पंदित वे अधर
तृप्त होते
है नयन
पलकें प्रथम चरण मे ।
स्नेहों के क्षण मे ।। 2
मन मनो की है भृमर नजदीक से चक्कर
जब दृग ओझल हुये तो भटकता अक्सर
ढूढता
सुरभित कुसुम
क्षण में कई अरण मे ।
स्नेहों के क्षण मे ।। 3
तारतम्यतामय गिरे ज्यों गिरि से जलधारा
त्यों दृगों की वो किरण फिसले तो फौव्वारा
कर रहे
स्पष्ट छाती
कान्ति आवरण में ।
स्नेहों के क्षण में ।। 4
इक भाव सा इक चित्र सा इक दृश्य आकरके
पलको पर उमड़ा रहे कुहरों सा छा करके
रहे टपकता
फिर बूंदों सा
जीवन भर स्मरण मे ।
स्नेहों के क्षण मे ।। 5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
58- भयभीत नही है भारत
आतंकवाद की
इस आँधी मे
बढ़ता है संहारत ।
भयभीत नही है भारत ।।1
रणधीर और रणवीरों की सदा समर्पित निष्ठा
स्वाभिमान स्वदेश हित निज गौरव प्रतिष्ठा
संरक्षण में
इस जीवन का
करते सफल मनोरथ ।
भयभीत नही है भारत ।।2।।
मुँहलगे शिशु सा राहों पर चलना जिसे सिखाते
वही धर्मच्युत हो पथभृष्ट है आतंक बढ़ाते
पैर खींचते
दब जाते है
बनता नही बिगाड़त ।
भयभीत नही है भारत ।।3
देशभक्ति बस एक धर्म है एक है भारतमाता
सन्तानें हर एक सिपाही एक राष्ट्र निर्माता
अखिल विश्व मे
पावन यस को
बढ़ जाता विस्तारत ।
भयभीत नही है भारत ।।4
पुरुष सिंह सो रहे अभी शावक बना बातूनी
जग जायेंगे मिट जायेगा दाँव पेंच कानूनी
तब गर्जन में
अरि मर्दन में
मिले नही उपचारक ।
भयभीत नही है भारत ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
59- 🌷फिर भी न होता सन्तोष🌷
शुद्ध गिरगिटी बना आग़ोश ।
फिर भी न होता सन्तोष ।1
अभिलाषा के प्राप्तार्थ
भूलकर अपना यथार्थ
नाम बड़े पर दर्शन छोटे की करते जाते है जयघोष ।
फिर भी न होता सन्तोष ।।2
ऊँची घात लगाते झटपट
ऊँट बैठता है जिस करवट
लम्बे-लम्बे व्याख्यानों में बन जाते है सरफिरोश ।
फिर भी न होता सन्तोष ।।3
न ऊँच नीच ,न जाति पात
तू डाल डाल, मैं पात पात
मुख मे राम बगल मे छूरी ,पिछलग्गू रहते निर्दोष ।
फिर भी न होता सन्तोष ।।4
विपक्षी बाजी मार ले जाते
भाड़े के टट्टू बन जाते
अवसर मिले तो दाँव लगा देँ मातृभूमि का भी रजकोश ।
फिर भी न होता सन्तोष ।।5
नेता सब एकजुट उमड़े है
राजकोष पर टूट पड़े है
जीती मक्खी निगल रहे है बचता नही है पास पड़ोस ।
फिर भी न होता सन्तोष ।।6
हर दफ्तर में मुठ्ठी गर्म
स्वाभिमान खो देते हम
अपनी अपनी राग अलापे जनता भी जी रही खामोश ।
फिर भी न होता सन्तोष ।।7
वुद्धिजीविओ आगे आओ
टूट पड़ो ,मत टांग अड़ाओ
ख़ाक छानते रह जाओगेँ मिट जायेगी सारी होश ।
फिर भी न होता सन्तोष ।।8
तलवे धोवोगे ,मिट जायेगा ,
देश तुम्हारा लुट जायेगा
आतंकित हैं भारतमाता इसका है जादा अफ़शोष ।
फिर कैसे होता सन्तोष ।।9
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
60- 🌷रोको, मत बह जाने दो🌷
स्नेहों की
लहरों पर
उर विह्वल हो जाने दो ।
रोको , मत बह जाने दो ।।1
नही ,नही वह स्नेहिल छवि पलको मे रह जायेगी
निशाकाल में परागकणों सी ओशों में गल जायेगी
धूमिल छवि मे
उषाकाल तक
उम्मीदें भर जाने दो ।
रोको , मत बह जाने दो ।।2
क्या क्रोधों के उद्गम से स्नेह हिमालय बह जाता
मुरझायी पर एक कुमुदिनी पर ही भृमर मंडराता
अन्तःकरण को
दो छण तम में
हर्षित कर सह जाने दो ।
रोको , मत बह जाने दो ।।3
घन के घनघोर बरसने से हरियाली लहराती
तन पर बूदों के रिसने से कोमलता इठलाती
कोमलता पर
आकर्षण को
इतना ना हर्षाने दो ।
रोको , मत बह जाने दो ।।4
प्रमुदित भावों को चुनकर के चिड़ियाँ गेह बनाती
शीत एवं बरसातों में निज निर्मित नेह सजाती
बारिश के इन
बौछारों को
आँखों पर मत आने दो ।
रोको , मत बह जाने दो ।।5।
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
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