हाइकु विधा, परिभाषा उदाहरण, रचनाएं

#हायकु क्या है ?

हायकु जापान की एक विधा है । जापानी कवि बाशो को इसका जनक माना जाता है । यह एक विषम वर्णिक छंद है । इसमें तीन चरण और कुल 17 वर्ण होते है ।प्रत्येक चरण स्वतन्त्र होता है । अपूर्ण वर्ण नही गिने जाते है । भाव और ,विम्ब विधान वाली इस रचना में 'गागर में सागर' भरना होता है ।
जैसे--
प्रथम चरण में 5 वर्ण जैसे
       'रूप तुम्हारा'
दूसरे चरण में 7 वर्ण होता है ।जैसे-
       'प्रकृति का दर्पण :
तीसरा चरण तो बहुत ही महत्वपूर्ण एवम् भावपूर्ण होता  है ।
: तीसरे में पुनः 5 वर्ण
जैसे
              'इंद्रधनुष,
आपकी कविता बन गयी ।

रूप तुम्हारा
प्रकृति का दर्पण
इंद्रधुनष


:::::::::हाइकु परिभाषित हाइकु :–
1–

तीन चरण
दोनों पाँच वर्ण के
मध्य के सात
2–
रचें हाइकू
गागर में सागर
भाव विशेष 

     –रकमिश सुलतानपुरी

        हाइकू।रेंगती धूप।

1_
घना कोहरा
धरती सवाँरती
फैली चादर
2_
मौसम फिर
बदले करवट
काँपते लोग
3_
रेंगती धूप
कोहरे के ऊपर
बेहाल धुंध
4_
भींगी धरती
दिनकर का तेज
रोता कुहरा
5_
कड़ाकी ठण्ड
धूप भी अंगड़ाती
राहत मिली

   –रकमिश सुलतानपुरी




उद्योग पर हाइकु:–

1
उद्योग धंधे
सम्पन्नता आधार
देश विकास
2
देश की नींव
रोज़गार सृजन
सम्पन्न लोग
3
कर्म हो श्रेष्ठ
लँगड़ी धर्मांधता
ऊँची छलाँग
4
लधु उद्योग
बढ़े स्वावलंबन
श्रम की जीत
5
उद्योगपति
कानून नियंत्रित
सुखी श्रमिक

            
           रकमिश सुल्तानपुरी


चुनाव पर हाइकु ::–

1-
सम्यक सोंच
निष्पक्ष हो चुनाव
डालें वोट
2-
चुने प्रत्याशी
वतन समर्पित
करे विकास
3
चुनाव चिन्ह
बिकाउँ जनमत
एक छलावा



जीवन साथी पर हाइकु::–

1
सूर्य चन्द्र सा
सुख दुःख समझे
जीवन साथी
2
प्रेम की डोर
जीवन पगडण्डी
विश्वास पग
3
दूजे के प्रति
समर्पित भावना
अपनापन 
4
मन का योग
सुखद अभिलाषा
ख़ुसी के फूल
5
साथ न छोड़ें
तन ,मन ,धन से
जीवन भर

           रकमिश सुल्तानपुरी

रंग पर हाइकु ::–

1
विविध रंग
जीवन रूपी फ़ूल
चुनता वक्त
2
जग बावरा
परोसता है स्वार्थ
सुख मे दुःख
3
प्रेम से दूर
बदरंगी दुनिया
झूठी ख़ुशियाँ 
4
प्रकृति शांत
गरजता मनुज
बरसा पाप
5
स्वार्थी दुनिया
गिरगिट सा रंग
धन प्रधान
6
कनक नही
कर्म की पिचकारी
प्रेम के रंग
7
चलो उकेरें
सदगुण के रंग
जीवन तल 

        रकमिश सुल्तानपुरी

=तांका=–

1
          अर्धनग्नता
          अडिग कँपकपी
          ठिठुरी ठंड
          महँगाई की मार
          अब करे शिकार
2
          देख रंकिता
          शर्माती है दो आँखें
          फटे पजामे
          टकटकी लगाते
          आँसू नम हो जाते 
3
          जले अलावे
          जल उठा गरीब
          तपे गरीबी
          फैला रहा कुहासा
          अतृप्त अभिलाषा 
4
          माह का अंत
          उम्मीद की किरणें
          सूर्य निकला
          फिर चन्द्र कलाएँ 
          घटती घटनाएँ 
5
          मुँह चिढ़ाते
          सन्नाटे के वे ताने
          भाव के पंक्षी
          बैठ दुःखों की डाल
          भौतिकता की जाल

                  रकमिश सुल्तानपुरी

सूर्योदय पर हायकु::–

1
मन के पंख
क्षितिज की शाखायें
भावुक पंक्षी
2
बादल गीत
सुने धरा का पानी
भरता स्वर 
3
सूरज पंक्षी
चुनता नभ तारे
हुआ सबेरा 

    –रकमिश सुलतानपुरी


प्रकृति पर हायकु:::–

1
प्रकृति खेले
ले बादल की ओट
आँख मिचौली
2
जागा सूरज
अवनत प्रभात
डरी चांदनी
3
तड़पे सूर्य
ठिठकती दिशाएँ
तपती धरा

    –रकमिश सुलतानपुरी

प्रेम पर हायकु::–

1
चलो बसाये
क्षितिज के समीप
प्रेम का घर
2
सघन वन
ठहरा है सन्नाटा
पवन स्तब्ध
3
सुने दिशाए
पंछी का कलरव
नदी के गीत
4
चलो बसाये
हम तुम मिलके
रैन बसेरा 
5
रात अँधेरी
ठहरी हो चांदनी
उर के दीप 

    –रकमिश सुलतानपुरी


विभिन्न हायकु:–

1
नही मिला क्यों
बिचौलिये हँसते
सूखा राहत 
2
तब की बातें
अनकही ही रही
कहता कौन
3
राहें थकती
अंत क्षितिज तक
चले आदमी
4
यादों का बिम्ब
नशे का आकलन
करता कौन
5
एक मसीहा
बनकर जीवन
खुद को जानो
6
नही मिलेगा
क्षितिज कही पर
सफेद झूठ
7
रात अँधेरी
दुःख बरसाकर
करे तमसा

  –रकमिश सुलतानपुरी

_संध्या पर हायकु –

1
बड़े सबेरे
फैले बादल नभ
सूरज झाँके
2
बिखर गयी
खेतों भर ठहरी
हवा सयानी
3
सरसो फैली
नव किसलय पर
सन्ध्या मौन

    –रकमिश सुलतानपुरी


किताब पर हायकु:–

1
फ़टी किताबे
नोक टुटी पेंसिल
वर्ण अबोध ।।।।
2
मूक आवाजे
मुह खुलने तक
आती जाती ।।2।।
3
डर के मारे
चुप मुखमण्डल
गोला गिनती।।3।।

    –रकमिश सुलतानपुरी


दुर्दिन पर हायकु::–

1
अनचाहे वो
थपेड़े लगते है
दुर्दिन तक
2
भरोसा तेरा
हृदय निलय से
ढह न जाये
3
जीवन तक
उम्मीदों की आहट
टूटे तो कैसे ।।

       –रकमिश सुलतानपुरी



  ममता पर हायकु::–

1
ममता जागी
डोली की सहनाई
अपने घर
2
बिटिया रानी
बरसो से कहती
चली जाउंगी
3
उमड़ पड़ा
रुका हुआ स्नेह
आंसू की धार

     –रकमिश सुलतानपुरी



  दिन पर हायकु::–

  
1
कट गये है
कितनी फसलो में
यादो के दिन ।।1।।
2
झर गये है
आँशू बेबस थे
पतझड़ में ।।2।।
3
रह गयी है
फिर भी उम्मीद
रहने तक  ।।3।।

  –रकमिश सुलतानपुरी



 बसंत पर हायकु::–

1
बिहँस उठी
पंख पसार कर
पीली सरसों
2
इठलातीं है
नवल किसलय
तितली मन 
3
फैला कुहरा
दिनकर ठहरा
ऋतु बसन्त 

   –रकमिश सुलतानपुरी



  वक्त पर हायकु::–

1
वक्त का पौधा
हरियाली पनपी
मिलती राहे ।।
2
तकलीफों का
पुनः पुनः प्रहार
बढ़ते चल ।।
3
झुलसे क्यों
हम पाकर साथ
अनुभव का ।।

  –रकमिश सुलतानपुरी


किसान पर हायकु::–

1
झुझलता है
किसान का बैल भी
चलता कैसे ।।1।।
2
बच्चे उनके
मेड़ो पर थी घासें
बरसा पानी ।।2।।
3
धुँधली शाम
अधपकी रोटिया
आधे कपड़े ।।3।।
4
टूटी खटिया
मन के सपनो में
मिड डे मील ।।4।।

    –रकमिश सुलतानपुरी


बिटिया पर हायकु:–

1
बरसे बादल
फिर ढही दिवाले
इंद्रधनुष ।।
2
छप्पर से ही
मटमैली आँखों में
टपकती है ।।
3
दो दो करके
धाराये बौछारों की
सरपत से ।।
4
छोटी बिटिया
सुलगती उपले
तेल का डिब्बा ।।
5
माचिस पर
ढुरका बरबस
आँख का पानी ।।
6
झल्लाती है माँ
ममता का संचार
रुकी आहत ।।
7
देख दीनता
छुपता न तो कैसे
सूर्य नभ में ।।

    –रकमिश सुलतानपुरी


रिस्ते पर हायकु::–

1
टूटी टहनी
एक पुराना रिश्ता
ढह जाता है ।।
2
दो दिन बाद
नये अंकुरण से
जुड़ जायेगा ।।
3
ओझल होते
परछायी बनके
यादो के दिन  ।।
4
नया बसेरा
सम्बन्धो की दूरी तो
खलती ही है ।।
5
मत कहना
अलविदा किसी को
जीवन भर ।।

  –रकमिश सुलतानपुरी



 दुःख पर हायकु:–

1
मेरे दुःख में
मत मिल जाने दो
अपने सुख ।।
2
थोडा ही तो है
ऋणी करो न आज
कुछ तो सोचो ।।
3
दुःख के क्षण
तृप्त कर लेने दो
मीठा आभाष ।।
4
आँखों के पास
बन सुख की छाया
तुम हो क्या ।। 
5
इंद्रधनुष
घन बरसे दुःख
प्रेम तुम्हारा ।।

  –रकमिश सुलतानपुरी


दिन पर हायकु:–

1
तब के दिन
कुछ धुंध निगाहे
आँख में पानी
2
प्रेम प्रभा वह
दीप्तिमान आँखों में
इंद्रधनुष सी 
3
दो दिन बीता
संदेहो की आहट
रोज बुलाती
4
कह दू कैसे
बोझिल से लगते
अब के दिन

    –रकमिश सुलतानपुरी


धूप पर हायकु::–

1
ठहरी धूप
बगीचे में ही कल
छाया भ्रमित 
2
मींलों चलती
नदियाँ में विश्राम
हवा सयानी 
3
धोते है चोंच
चिरंगुन धूमिल
धूलधूसरित 

  –रकमिश सुलतानपुरी


रात पर हायकु::–

1
ख़ामोश रात
सन्नाटे की आहट
उड़ा उलूक
2
रूप तुम्हारा
झिलमिलाती आँख
बिना रूप के
3
स्वप्नलोक मे
धुँधली सी छाया
इंद्रधनुष 

    –रकमिश सुलतानपुरी


बादल पर हायकु:

1
बादल गाये
सुनेगी ये दुनियां
राग तुम्हारा ।।
2
चलो बनाएँ
सतकर्मो का ढाँचा
प्रेम की सीढ़ी ।।
3
लिख देना है
भौतिकता से उठ
संदेशे कुछ  ।।
4
धरा संजोयें
तड़पती धूप में
प्रेम की बूंदे  ।।
5
बादल मौन
घुमक्कड़ पगला
रोता ही कैसे ।।

  –रकमिश सुलतानपुरी

 
सूरज पर हायकु::–

1
उगता सूर्य
गंगा का नदी कूल
शुभ प्रभात
2
अंजुलि भर
दिवाकर पूरब
पावन जल 
3
देखो बादल
जाते पँख फैलाते
करके स्नान 
4
श्रद्या ही पूजा
कलरव की ध्वनि
मंत्र का पाठ 
5
चलो जगाये
ड्डूबा हृदय बीच
मन का सूर्य 

    –रकमिश सुलतानपुरी

नदी पर हायकु:–

2
सागर दूर
ढूढ़ें अपना प्यार
पागल नदी 
2
जीवन जल
छटपटाती धारा
साँस तरंग 
3
देखे प्रकृति
नदी के पगचिन्ह
जल प्रपात
4
दोनों किनारे
नदी हाशिये पर
तरसे प्रेम 
5
प्यासा सागर
समाहित भवरें
संतृप्त नदी 

  –रकमिश सुलतानपुरी

  तितली पर हायकु::–

1
तितली बीने
कण कण शहद
मधु की शाला 
2
अमृत सेती
परागित कुसुम
तितली रानी 
3
तितली देखे
प्रतिबिम्बित तन
दर्पण पुष्प
4
इठलाती है
स्पंदित पंखो पर
सम्हल गयी
5
इंद्रधनुषी
रूप सजाये फूल
रंगे तितली 

   –रकमिश सुलतानपुरी


धूप पर हायकु::–

1
घना कोहरा
धरती सवाँरती
फैली चादर
2
मौसम फिर
बदले करवट
काँपते लोग
3
रेंगती धूप
कोहरे के ऊपर
बेहाल धुंध
4
भींगी धरती
दिनकर का तेज
रोता कुहरा
5
कड़ाकी ठण्ड
धूप भी अंगड़ाती
राहत मिली

    –रकमिश सुलतानपुरी


पंछी पर हायकु::–

1
कौवे का पंजा
निर्मम था प्रहार
मौत की नींद
2
जान में जान
हृदय प्रफुल्लित
आँखे आवाक
3
उनींदी आँखे
अधखुले थे चोंच
जीवन लौटा
4
शिथिल हुई
अवनत मुख से
मृत्यु खामोश
5
कहता कैसे
विरह हृदय की
ठहरा पंछी 
6
डगमगाते
उड़ना है दुस्वार
चोटिल डैने   

 –रकमिश सुलतानपुरी


गोरखधंधा पर हायकु::–


1
प्रतियोगिता
परीक्षार्थी थरता
ठण्ड रजाई
2
चीथड़े पन्ने
भविष्य झलकता
जलती बाती
3
दो दरवाजे
फॉर्म निकालो पैसा
गोरखधंधा
4
कटी पतंग
टूटती हैं उम्मीदें
ढरते आँशू
5
भ्रष्ट आचार
भ्रष्ट है नागरिक
भ्रमित नेता 

   –रकमिश सुलतानपुरी


अनुभव पर हायकु::–

1
जीवन वृक्ष 
सुख दुःख की मार
फले तजुर्बा
2
कलयुगी माया
बुद्धिमान की हार
हँसता मूर्ख
3
शोषित लोग
पनपती है आशा
खलता सुख
4
रोती किस्मत
रोता फिरे गुमान
खून के आँशू
5
स्वार्थ विबस
रोती आवश्यकता
प्रेम के आँशू
6
दुर्जन पाता
हृदय पर घाव
प्रेम पथिक
7
भौतिक सुख
हवस प्रतिपूर्ति
प्रेम प्रपंच 
8
थोथा विद्वान
गंगा तट को छोड़
करे अजान
9
झूठ दिखावा
सभ्यता अवनत
जड़े तमाचा 
10
करें निर्माण
सच्चाई का दर्पण
कवि हृदय       

   –रकमिश सुलतानपुरी

झूठ पर हायकु::–

1
झूठ देवता
सच माँगता भीख
गरिमा दुखी
2
सुनते उर
कल्पनाओ के ओट
खुद के भाव 
3
ठण्ड का दर्द
जन जीवन बेहाल
ठहरी धूप
4
कँप ही गयी
बहे ठंडे थपेड़े
बेचारी रात
5
सहमी बर्फ
ठिठुरा हिमालय
धूप की टोपी

    –रकमिश सुलतानपुरी

 नाविक पर हायकु::–


1
लौटा न पाये
नैया डूबी भवर
नाविक कैसा
2
उम्र की धार
जीवन का संघर्ष
जाना है पार  
3
जीवन मर्म
ढूंढते मृत्यु द्वार
कल्पित स्वर्ग 
4
बाल सफ़ेद
साथ छोड़ता तन
मिला किनारा
5
जीवन मृत्यु
करे नये प्रयोग
रचें तमासा

   –रकमिश सुलतानपुरी


ठंड पर हायकु::–

1
आयी ठण्डक
कांपती गरीबता
बना मज़ाक
2
जले गरीब
तापती महँगाई
बढ़ती ठण्ड
3
कुहरा धुंध
झांकते दरवाज़े
सहमे तन
4
रेंगता मित्र
ओढ़कर बादल
पश्चिम दिशा
5
रुकी है शाम
सुबह के ही घर
प्रकृति इच्छा

 
  –रकमिश सुलतानपुरी


  मन पर हायकु::–

1
मन का पेड़
फलती है भावना
बिनते शब्द
2
शब्द प्रवाह
उपजाते है बिम्ब
देखता मन
3
मन में बसी
ठहरती कल्पना
तौलता उर
4
उर संतृप्त
हिमालय ठहरा
द्रवित आह
5
आह की गर्मी
पिघलता हृदय
आँखे सरिता

    –रकमिश सुलतानपुरी


प्रकृति पर हायकु::–

1-
प्रकृति क्रोध
चेन्नई ने देखा है
हुआ विनाश

2-
गाँवो के बीच
नहाती थी गलियाँ
पुलों के पार

3-
खेली प्रकृति
थर्राया है जीवन
दबती चींखें

4-
बहते लोग
डरी थी मानवता
तैरता शहर

5-
अंधा सूरज
गुर्राती विजलियां
गरजे मेघ

6-
दिये उजाड़
वन बाग बसाव
भव्य घरौंदे

7-
टूटा कहर
टूट गयीं उम्मीदें
सहते लोग

8-
मानव रचे
जगमगाता दृश्य
हुआ तबाह

9-
हे भगवान
आत्मशांति फ़ैलावो
पीड़ित लोग

10-
भर दे शान्ति
दुर्दिन से निपटें
देश हमारा 

   –रकमिश सुलतानपुरी


नदी पर हायकु:–

1
बिन साहिल
बहती ही रहती
आँखों की नदी
2
दुःखों की गर्मी
पिघल ही जाती है ।
सूखी नदियां 
3
विह्वल नदी
समय की परिधि
सागर मिले 
4
नदी प्रेमिका
बेवफा हिमालय
पिघले तन 
5
रचे विहार
मैदानी पगचिन्ह
गोखुर झील

  –रकमिश सुलतानपुरी

ढोंग पर हायकु::–

1
करता कर्म
साधना में तल्लीन
योगी बगुला

2
साधक बने
दो राहें तो दुबिधा
एक हो लक्ष्य

3
भौतिक जल
माया का आवरण
छिपता ध्येय

4
ध्यान की शक्ति
स्पस्ट करे उद्देश्य
ज्ञानी बगुला

5
प्राप्त हो जाता
मीन सा एक लक्ष्य
बगुल दृष्टि

  –रकमिश सुलतानपुरी

 स्वार्थ पर हायकु::–

1.
बोती लालच
उगे ढाक के पात
स्वार्थी दुनियां

2.
गाते है बैल
महँगाई के गीत
जुते किसान

3.
सूखी धरती
महँगाई तपती
बरसे आँशू

4.
भींगे नयन
ढाँढस मांगे उर
दाता है मौन

5.
मुस्काई ठण्ड
तापता है गरीब
दुःख की ज्वाला 

6.
निकला पैसा
रूपये की मसीन
पिसे गरीब 

7.
पूस की रात
कुहरा घनघोर
मांगती ठण्ड 

8.
कस्तूरी छिपी
महकता है सुख
पागल मृग 

9.
ढोंगी दुनियां
ओढ़े कपटी प्रेम
रोते सज्जन

10.
उड़े कल्पना
भौतिकता उलझे
रचें हाइकू

  –रकमिश सुलतानपुरी


प्रकृति पर हायकु::–
1
चाँद अकेले
नभ में तारों संग
आज है तन्हा
2
शाम ढली है
रात भरे खर्राटे
नदी किनारे
3
फूल लालची
कलियां मुँह खोले
पियें चांदनी
4
हँसी ले रहे
घन लगा ठहाके
सन्नाटे बोले
5
पहने स्नेह
धरती हरियाली
उम्र नादान
6
जगाने आया
बेसुध पड़ी रात
भोर का तारा
7
आँखे उदास
इंतजार का दुःख
दर्पण नदी
8
प्रतिबिम्बित
आज रूप तुम्हारा
देखेगा चाँद
9
आह से डरे
महकते वो फूल
भावना खिली
10
तुम आ जाओ
तन में लगी आग
जलती नदी
11
स्मृति के पार
रात ढलेगी, उम्र
कब आओगे

    –रकमिश सुलतानपुरी


समाज पर हायकु::–

2
परम्पराएँ
गंगा नदी का तट
धोतीं है केश
2
ह्रदय रचे
अलौकिक दर्पण
दिखे समाज
3
छाये बादल
युवा करें आह्वान
बरसे ज्ञान
4
स्नेहो की जीत
निजता भी न खोये
सुन्दरताएं
5
रोता क्यों न्याय
चलो जलाएँ दीप
झूठा अन्याय

  –रकमिश सुलतानपुरी


ठंड पर हाइकु::–

1
ठण्ड कड़ाकी
कप गया सूरज
सिंहरी धरा
2
पंछी चहके
सन्नाटा डरा सा है
सुनता कौन
3
हँसते फूल
किरण सुनहरी
पीता कुहरा 

   –रकमिश सुलतानपुरी



निशा पर हायकु:::–

2
खेलने आया
बचपन लेकर
सूर्य नभ में
2
ढरती ओश
तपती दुपहरी
यौवन आया
3
ढलती शाम
नदी हुई ख़ामोश
निशा ठहरी

    –रकमिश सुलतानपुरी

   

धनतेरस पर हायकु::–

1
शाम की छाया
अंधकार बनती
आर्त भाव से
2
दीप जले है
भक्ति भावना
मन में मेरे
3
गणेश लक्ष्मी
हर आँगन तेरी
राह ताँकता
4
दो रूपों संग
नेह भक्ति की इच्छा
अब आ जाओ
5
कर ही देना
आशा रूपी ,मन में 
धन की वर्षा
6
हर प्राण में
घुल मिल जाये ये
महिमा तेरी
7
अंधकार में
बढ़े उजाला ,शुभ
धनतेरस 

     –रकमिश सुलतानपुरी


भक्ति पर हायकु::–

2
अभी सबेरा
दोपहर के बाद
छायेगी श्रद्धा
2
पुनः शाम को
कलरव आरति
शंख ध्वनि से
3
लगेंगे तांते
हल्दी चन्दन टीके
अलख जगेगा
4
भव्य रूप का
झिलमिल चित्रण
दर्शन होगा
5
बजे नगाड़े
गूँजेंगे जयकारे
जय माता दी

  –रकमिश सुलतानपुरी

नारी पर हायकु::–

1
सच है पर
बढ़ती तो गरिमा
बनी परिधि में
2
कैसे कहता
सच्चाई को खुद से
रहने ही दो
3
सुंदरता में
अंग प्रदर्शन क्यों
खुद ही सोचो
4
नारी महिमा
मुनि ऋषि देव भी
थक जाते है
5
तब की नारी
मर्यादित ,रत थी
पति सेवा में
6
खुद ही कैसे
समाज बदलेगा
फर्क न होता 
7
लोग यहा के
झूठे चेहरे पर
सच दर्शाते

    –रकमिश सुलतानपुरी


ममता पर हायकु::–

1
ममता जागी
डोली की सहनाई
अपने घर
2
बिटिया रानी
बरसो से कहती
चली जाउंगी
3
उमड़ पड़ा
रुका हुआ स्नेह
आंशू की धार


  –रकमिश सुलतानपुरी



उम्मीद पर हायकु::–

1
अनचाहे वो
थपेड़े लगते है
दुर्दिन तक
2
भरोसा तेरा
हृदय निलय से
ढह न जाये
3
जीवन तक
उम्मीदों की आहट
टूटे तो कैसे ।।

     –रकमिश सुलतानपुरी


नेता पर हायकु:–

1
हुआ सबेरा
पिछलग्गू के साथ
छाये नेता जी .
2
दरवाजे पे
आते बिना बुलाये
दस्तक देते .
3
राजनीति में
ठूठ पड़े वृक्षो से
फूटे अंकुर .
4
होती बारिस
खेत गये है सूख
वादा करते .
5
ओझल होते
चैती की हरियाली
उम्मीदें ,नेता .

  –रकमिश सुलतानपुरी


दुःख पर हायकु:–

1
मेरे दुःख में
मत मिल जाने दो
अपने सुख ।।
2
थोडा ही तो है
ऋणी करो न आज
कुछ तो सोचो ।।
3
दुःख के क्षण
तृप्त कर लेने दो
मीठा आभाष ।।
4
आँखों के पास
बन सुख की छाया
तुम हो क्या ।। 
5
इंद्रधनुष
घन बरसे दुःख
प्रेम तुम्हारा ।।

         
    –रकमिश सुलतानपुरी


 टहनी पर हायकु:–


1
टूटी टहनी
एक पुराना रिश्ता
ढह जाता है ।।
2
दो दिन बाद
नये अंकुरण से
जुड़ जायेगा ।।
3
ओझल होते
परछायी बनके
यादो के दिन  ।।
4
नया बसेरा
सम्बन्धो की दूरी तो
खलती ही है ।।
5
मत कहना
अलविदा किसी को
जीवन भर ।।

   –रकमिश सुलतानपुरी


 कृषक पर हायकु:–

1
झुझलता है
किसान का बैल भी
चलता कैसे ।।1।।
2
बच्चे उनके
मेड़ो पर थी घासें
बरसा पानी ।।2।।
3
धुँधली शाम
अधपकी रोटिया
आधे कपड़े ।।3।।
4
टूटी खटिया
मन के सपनो में
मिड डे मील ।।4।।

  –रकमिश सुलतानपुरी

बिटिया पर हायकु:–

1
बरसे बादल
फिर ढही दिवाले
इंद्रधनुष ।।
2
छप्पर से ही
मटमैली आँखों में
टपकती है ।।
3
दो दो करके
धाराये बौछारों की
सरपत से ।।
4
छोटी बिटिया
सुलगती उपले
तेल का डिब्बा ।।
5
माचिस पर
ढुरका बरबस
आँख का पानी ।।
6
झल्लाती है माँ
ममता का संचार
रुकी आहत ।।
7
देख दीनता
छुपता न तो कैसे
सूर्य नभ में ।।

  –रकमिश सुलतानपुरी

 दिन पर हायकु:–

1
तब के दिन
कुछ धुंध निगाहे
आँख में पानी
2
प्रेम प्रभा वह
दीप्तिमान आँखों में
इंद्रधनुष सी 
3
दो दिन बीता
संदेहो की आहट
रोज बुलाती
4
कह दू कैसे
बोझिल से लगते
अब के दिन

  –रकमिश सुलतानपुरी

 
अनुभव पर हायकु:–

1
वक्त का पौधा
हरियाली पनपी
मिलती राहे ।।
2
तकलीफों का
पुनः पुनः प्रहार
बढ़ते चल ।।
3
झुलसे क्यों
हम पाकर साथ
अनुभव का ।।

     –रकमिश सुलतानपुरी

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