11- 🌷तुमको ही है करना न्याय🌷
जब हमको देना पड़ जाये रिस्तो का साबूत
जब हृदय को लगे सताने सम्बंधो का भूत
खुद से डर के
आहे भर के
मत सहना अन्याय ।
तुमको ही है करना न्याय ।।1
जब झूठ और सच के मन्थन में न निकले कुछ निर्णय
दो रहो पर मन फ़स जाये कुछ बोल न पाये हृदय
मत डर ऐसें
दुनिया पैसे
लालच के अध्याय ।
तुमको ही है करना न्याय ।। 2
जब तेरी गलती बन जाये चर्चाओ की धार
झूठी मूठी प्रसंशा के जब हो पुल तैयार
रुको वहा पर
सोचो उन पर
दुःख के है पर्याय ।
तुमको ही है करना न्याय ।।3
जब करो दोस्ती, प्यार करो या साथ करो तुम आगे
अजमाना मत इन रिस्तो को ये है कच्चे धागे
होगी मुश्किल
मत तोड़ो दिल
बन्द करो व्यवसाय ।
तुमको ही है करना न्याय ।। 4
जब आँखों को लगे गलत कुछ और हृदय न माने
उस रिस्ते से दूर रहो तुम जाने या अनजाने
आहत न हो
कोई हृदय
अपनपन भी टूट न जाय ।
तुमको ही है करना न्याय।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
12- 🌷आज नही तो दो दिन बाद🌷
इस बचपन की नादानी में खुशियो की किलकारी
छुपी हुई थी कभी हमारी आज तुम्हारी बारी
यह चंचलता
व्याकुलता में
हो ही जायेगी बर्बाद ।
आज नही तो दो दिन बाद ।।1
ये जीवन की नयी उड़ाने खुशियों के प्रलोभन
नाशवान इस आकर्षण में समय सहित सारा धन
चुक जायेगा
जायेगा रुक
आशाओ का यह उन्माद ।
आज नही तो दो दिन बाद ।। 2
रूपो की यह सुंदर छाया स्वप्नो में अनुमोदन
स्नेहो में संकेतो में नयनो से सम्बोधन
घटते घटते
मिट जायेगी
रह जायेगी धुँधली याद ।
आज नही तो दो दिन बाद ।।3
उठती ये खुशियों की लहरे घटते दुःख के बादल
लाभ हानि की सारी चिंता कर देती जो पागल
भले आज तुम
कोशिश कर लो
पर गिरनी है तुम पर गाज ।
आज नही तो दो दिन बाद ।।4
सभी रास्ते इस जीवन के सिर्फ दुःखों के जाल
क्यों डरते हो ,डरना किससे फसना है हरहाल
फ़सा हुआ है
नश्वरता में
होना तो होगा आजाद ।
आज नही तो दो दिन बाद ।।5
-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
13- 🌷तब खुद को मैंने समझाया🌷
यह जीवन है इक पगड़न्ड़ी काली रात घनेरी
खुद की मानो भरो हौशला कभी करो न देरी
हर सिक्का वह
खोटा निकला
जिसपर मैंने दाँव लगाया ।
तब खुद को मैंने समझाया।।1
धुंधले होंगे भाग्य तुम्हारे टिमटिम करते तारे
दूर दूर तक रहे चाँदनी है दुःख के उजियारे
छाया फैली
सम्मोहन की
पग पग पर जिसने उलझाया ।
तब खुद को मैंने समझाया ।।2
झूठी होगी आश्वाशन में पली हुई लोलुपता
झूठे होंगे रिस्तो की वो अगम पिपासी क्षुधता
सिर्फ अकेले
हल करना था
एक पहेली सा सुलझाया ।
तब खुद को मैंने समझाया ।।3
जीवन नौका जग अथाह सागर तट फौव्वारे
भवरें भी है , गहरी खायीं' जर्जर है पतवारें
गोताखोर
सरिस है दुश्मन
अवसर पाते नाँव डुबोया ।
तब खुद को मैंने समझाया ।।4
अभी वक्त है कोशिश कर लो मंजिल की परवाह
प्रबल वेग से बढ़ते रहना तुम सतपथ की राह
उम्र ढली तो
खून के आंशू
न जाने कितनों ने रोया ।
तब खुद को मैंने समझाया ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
14- 🌷बाकी सब कुछ ठीक 🌷
उस मंजिल पर इन आखॊ से शिर्फ तुम्हारी आहट
आती तो हॆ न जाने क्यो बढ जाती घबराहट
अपने मन से
बडे अमन से
आता हूँ नजदीक ।
बाकी सबकुछ ठीक ।।1
उन आँखों मे खोज रहा हूँ अपने दिल की धड़कन
ताकि मुझको पता चल सके मेरा यह पागलपन
यह आशा है
परिभाषा हैं
मेरे मन की जीत ।
बाकी सबकुछ ठीक ।।2
धीरे - धीरे तन्हाई से गम को सहना सीखें
कभी कभी ही बढ़ पाती अब इस दिल मे तखलीफें
हैं अपना लक
निश्चित बेशक
लगे न कुछ भी नीक ।
बाक़ी सबकुछ ठीक ।।3
और शाम को सर्द हवायें देती है संदेश
सब कुछ पाने की आशा में बचा नहीं कुछ शेष
वे लम्हे थे
हम तन्हे थे
बाते थी सब लीक ।
बाक़ी सबकुछ ठीक ।।4
अब मेरा दिल सोच सोच कर हो जाता हैं बोझिल
फिर स्वप्नों मे आहट पाकर बढ़ जाती है मुश्किल
कितना अन्तर
हुआ निरन्तर
मिल जाती हैं सीख ।
बाक़ी सब कुछ ठीक ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
15- 🌷प्रेमपथों के एक पथिक से🌷
वर्षो पहले भटका था, थी ओशों की दो बूदें
अंधकार मे अँधा बनकर आहत आँखें मूंदे
विचलित था
पर भेंट हो गयी
स्नेहों के नेक धनिक से ।
प्रेमपथों के एक पथिक से ।।1
तुम मुस्काये और हृदय मे बनता गया झरोखा
आँखों के उन स्पंदन को मैंने भी न रोका
बढ़ जाने दो
संकेतों को
एक बार फिर और तनिक से ।
प्रेमपथों के एक पथिक से ।।2
सिर्फ तुम्हारी उन आँखों का आँखों का सम्बोधन
समझ सके तुम हुआ हृदय का स्नेहिल अनुमोदन
तुम जीते या
हार गया मैं
उस हृदय के मूक कथिक से ।
प्रेमपथों के एक पथिक से ।।3
हो सकता है एक रूप यह तेरे भोलेपन का
जीत लिया उर निश्चित तुमने आज मेरे इस मन का
अधिक अपेक्षा
क्या करता मै
स्नेहों के एक खनिक से ।
प्रेमपथों के एक पथिक से ।।4
यदि झूठा हो किसी रूप मे तेरा यह आकर्षण
मत कहना तुम करने देना इस हृदय को अर्पण
वरना फिर तो
पड़े हुये है
टूटे हृदय यहाँ अधिक से ।
प्रेमपथों के एक पथिक से ।
-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
16- 🌷काश! मुझे बतलाते🌷
दौड़ धूप कर हार जीतकर जीवन की वह अंतिम राह
पाकर तुमने क्या खोया है किसकी है तुमको परवाह
जिसके चलते
विचरण करते
निर्जन वन में आते ।
काश! मुझे बतलाते ।।1
सघन धूप सह दुर्बल काया आँखे भी कमजोर
कुछ बालों पर रुकी सफेदी चेहरे पर बिल्कुल घनघोर
क्या है आशा
क्या जिज्ञाषा
बढ़े हो जिनके नाते ।
काश! मुझे बतलाते ।।2
क्या डरे हुये हो वृद्धापन से सुनकर लोगों की वह बात
तख़लीफे हैं और बिवसता दुःखमय जीवन है विख्यात
प्रबंधन क्या
अवलम्बन क्या
लाठी पर डगमगाते ।
काश! मुझे बतलाते ।।3
क्योकि तुमने जीवन जीकर देख लिया परिणाम
असफल इन सम्बन्धो पर थोड़ा सा अनुमान
जिसको हँसकर
तहस नहस कर
कुछ लोग रहे झुठलाते ।
काश! मुझे बतलाते ।।4
अंतिम अवसर इस जीवन का क्या तुम हो तैयार
अगर नही तो कैसा होता नवनिर्मित संसार
कैसे करते
नही तरसते
कुछ तो राह सुझाते ।
काश! मुझे बतलाते ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
17- 🌷तब होगा सच का भुगतान🌷
झूठ और सच पता लगाना है कितना दुस्वार
सच्चाई का नही दिख रहा अब कोई आसार
भौतिकता में
स्वार्थपरकता
का करना होगा अनुदान ।
तब होगा सच का भुगतान ।।1
क्योकि इस मोबाइल युग मे इंटरनेट के नाते
होते - होते बड़ी हो गयी छोटी छोटी बाते
इन बातो को
बस हृदय से
अब करना है तुम्हे मिलान ।
तब होगा सच का भुगतान ।। 2
एक झूठ ही सारे सच को कर देता है झूठा
एक सत्य पर सिर्फ अकेले रचता दृश्य अनूठा
इस प्रकाश में
मिट जायेगी
झूठो की वह झूठी शान ।
तब होगा सच का भुगतान ।।3
सत्य अटल है ,अडिग रहा है ,निर्भय ,है बलसाली
सत्य उजाले सा प्रभावी झूठी रात है काली
अंध हृदय में
सच के दीपक
का करके देखो सन्धान ।
तब होगा सच का भुगतान ।।4
झूठ बोलना नही रही है कभी भी अच्छी बात
असहनीय यह कर जाती है हृदय पर आघात
जीवन से है
इसे मिटाना
बन करके कोई इंसान ।
तब होगा सच का भुगतान ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
18- 🌷कैसे कह दूँ मै तत्काल🌷
अब मत झांको इन आँखों से आँखों में परछायी
अब तो बिलकुल नही रह गयी भावो मे गहरायी
अस्थाई
ठहर गया है
सम्मोहन का जाल ।
कैसे कह दूँ मैं तत्काल ।।1
जब देखा था और आज भी तेरी यह सुंदरता
मनमोहक है पर आ जाती फिर से वही विबसता
हृदय तेरा
निष्ठुरता का
परिचायक चलता है चाल ।
कैसे कह दूँ मैं तत्काल ।।2
जिसके चलते मिले आज पर भावों का परिवर्तन
स्नेहो को भाँप रहे तुम संदेहो को मेरा मन
पर रहने दो
बहुत हो चुका
दर्द मिलेगा ही हर हाल ।
कैसे कह दूँ मैं तत्काल ।।3
वर्षो पहले आश्वाशन ही दे करके मुस्काते
आज मिले जब प्रेमपथो पर हम ही कदम बढ़ाते
अब क्या जब मैं
स्वम किसी की
आशाओ को रहा हू पाल ।
कैसे कह दूँ मैं तत्काल ।।4
बात नही की आकर्षण में कमी हुई कुछ तेरे
तस्वीरें है तस्वीरों पर ख़ामोशी है घेरे
जबकि तुमने
देख लिया है
खुद स्नेहो की हाड़ताल ।
कैसे कह दू मैं तत्काल ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
19- 🌷क्योंकि हारे का हरिनाम🌷
न जाने कितने लोगों ने किस्मत है अजमाई
किस्मत वालों की भी मैंने देखी है तन्हाई
फिर भी उनको
मिला नही निज
कर्मो का परिणाम ।
क्योंकि हारे का हरिनाम ।।1
जान- जान कर अंजाने मे करते है प्रयास
अवशर खोकर बन जाते है अनचाहा परिहास
आते जाते
दुःख के लक्षण
कुसमय ,कुदिन तमाम ।
क्योंकि हारे का हरिनाम ।।2
केवल श्रम से नही मिल सका जीवन का औचित्य
परिवर्तन से ही बढ़ता है प्रगतिशील आदित्य
कभी कभी तो
छिपना पड़ता
ताकी सफल मिले अंजाम ।
क्योंकि हारे का हरिनाम ।।3
उद्देश्यों की पूर्ति कभी क्या जीवन में हो पायी
तृप्त हुआ न वह भी जिसने किस्मत है अजमाई
और अंत में
निष्फल होकर
करता कौन आराम ।
क्योंकि हारे का हरिनाम ।।4
आश्वासन पर उम्मीदों पर वक्त फिसल ही जाता
भौतिकता के सधन कुंज में पता कौन है पाता
वर्तमान भी
बस ख्वाबों का
करता है अनुमान ।।
क्योंकि हारे का हरिनाम ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
20- 🌷नही हो सकी मेरे मन की🌷
आकर्षण में व्यथित हॄदय को कई बार समझाया
स्नेहों मे विह्वल विस्मृत समझ कहाँ वह पाया
आँखे प्यासी
सिर्फ रूप की
न की तन या धन की ।
नही हो सकी मेरे मन की ।।1
प्रयासों से ,अभ्यासों से स्मृतियों मे लाता
निर्जन मे अवसादों मे मन को मै बहलाता
ताकि चाहत
सिर्फ तुम्हारी
बनी रह सके इस जीवन की ।
नही हो सकी मेरे मन की ।।2
धीरे धीरे भौतिकता का बढ़ पाया जब भार
बढ़े फासले इतने लंबे घूमिल हो गया प्यार
सिर्फ तुम्हारी
ही आवाजें
आहट बन गयी इस निर्जन की ।
नही हो सकी मेरे मन की ।।3
और सफलता इस जीवन मे बहुत बार है पायी
फिर भी उनसे नही हो सकी तन, मन की भरपायी
नही मिली वह
मन के माफ़िक
इक पगड़न्ड़ी अपनेपन की ।
नही हो सकी मेरे मन की ।।4
न जाने जब अनजाने में जान गया जब जागे
प्रेमपथों की हर मंजिल है इक मंजिल के आगे
जहाँ पहुचकर
धूमिल होती
अभायें इस नवयौवन की ।
नही हो सकी मेरे मन की ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
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