रकमिश सुल्तानपुरी द्वारा रचित पुस्तक मुक्तांकुर के समस्त मुक्तक ::–
1-
राम सदा सच के प्रतिमूर्ति असत्य दशानन दम्भ दिखाता ।
दुष्ट सशंकित क्षुब्ध हुआ समझे निज को वह भाग्य विधाता ।
क्रोध भरा अभिमान करे हठ, क्रूर निरंकुश वैर रचाता ।
ध्वस्त घमण्ड हुआ क्षण में जब सत्य असत्य पे वाण चलाता ।
2-
सत्य सदा बलवान रहा पर झूठ अनीति लिये मदमाता ।
रूप अनेक असत्य धरे खल हार न मानत जाल बिछाता ।
क्रोध का बोध न द्वेष का भान, कुकर्म किये पुनि न पछताता ।
नित्य कलंकित मार्ग चुने निज कर्म सुकर्म सदा ठहराता ।
3-
सत्य खड़ा नित पाहन सा ,बलहीन असत्य को धूल चटाता ।
है दिनमान समान सदा सच ज्ञान प्रकाशित मार्ग दिखाता ।
पारस पत्थर सा गुणवान महान, कलंक प्रभाव मिटाता ।
दुर्जन को कड़वा लगता पर सज्जन का सच मान बढ़ाता ।
4-
पाप बराबर झूठ सदा, छल -छद्म भरे उर सूल चुभाये ।
क्लेश प्रभाव विक्षिप्त करे मन, तामस से तन रोग समाये ।
कुंठित भाव विचार, अमंगल कर्म , विकेक को नित्य सुझाये ।
'राम' मृषा सम दोष नही, सुख,जीवन ,जीव समूल मिटाये ।
5-
हार निरादर नित्य मिले, खल झूठ कलंकित रूप छिपाये ।
प्रीति ,सुनीति बिना छल के, सित सत्य असत्य को जीत दिखाये ।
द्वंद्व मृषा सच मघ्य निरन्तर व्याप्त रहे जग धूम मचाये ।
जीत रहा नित सत्य सदा शुभ, पावन, पुण्य का भान कराये ।
6
लिखो नवगीत गुंजित मन भरो कुछ भाव जीवन मे ।
कि जिससे हो मनुजता का पुनः उद्भाव जीवन मे ।
खिले वो अंकुरित पौधा दिशा निर्देशिका बनकर -
बहे सुख दुख के' आँसू बन सदा समभाव जीवन मे ।
7
हवा है, धूप, वर्षा, तम ,नदी , झरने ,वही सागर ।
वही जलचर, वही थलचर, तलातल मे वही नभचर ।
ख़ुदा है वो बसा मुझमे, बसा तुझमे, चराचर मे -
मिला हर गाँव ,गुरु मन्दिर, शिवालय मे उसी का घर ।
8
तोड़ विषमताएं धर्मों की गान करेगे होली मे ।
अंग अंग बदरंग करेगे मान करेगे होली मे ।
ले यारों को भंग संग हुड़दंग शरारा होना है ।
प्रेम का रंग लगाकर के सम्मान करेगे होली मे ।
9
हृदय की ख़ुशबू थी रकमिश चम्पा और चमेली थी ।
चन्द्र रश्मियों सी मुस्काने मन की वो अलबेला थी ।
आज छोड़कर मुझे जा रही तन्हाई के आँगन मे ।
कल ही रंग अबीरों के सँग जिसने होली खेली थी ।
10
हवा पश्चिमी ऐसी बरपी लग सकता अनुमान नही ।
नर नारी सब युवा वृद्ध मे सदगुण का अवधान नही ।
बदल चुका परिवेष देश का किसे कहोगे दोषी है-
तन मन से अब भारतीयता की होती पहचान नही ।
11
छोड़ प्रथाएँ हम भारत की करने लगे गुलामी फिर ।
शिष्टाचार छोड़ कर नफ़रत बीज बो रहें नामी फिर ।
अपने ही घर गाँव देश का पतन देख ख़ुश हो जाते-
किन्तु गैर देषों के भाते किस्से और कहानी फिर ।
12
हवा है धूप वर्षा तम नदी झरना वही सागर ।
वही जलचर वही थलचर तलातल मे वही नभचर ।
ख़ुदा है वो बसा मुझमे बसा तुझमे चराचर मे -
मिला हर गाँव गुरु मन्दिर शिवालय मे उसी का घर ।
13
कर्ज़दार हुंकार मुझी पर , धनवानों से तो डरती हो ।
नये दलालों नेताओं सी चाल दोगली तुम चलती हो ।
बदल रहा हूँ पथ जीवन के चौराहों से पगडण्डी तक -
अरे ग़रीबी! आज बता दे क्यों मेरा पीछा करती हो ।
14
भौतिकता के जटिल भवँर मे अंधा बनके मत फस जाना ।
जीवन है अनमोल रास्तों पर चलकर मंजिल है पाना ।
सम्बन्धो के फूलों मे नित अपने पन की ख़ुशबू भरकर-
अब ख़्वाबों से निकल असल मे बुनकर देखो ताना-बाना ।
15
है जीवन जीव बने निज मे, कुसुमादि मे अमृत लसते है ।
शशि, भानु समेत अगण्य सदा ,परभात किरण सँग हँसते है ।
जगदीश चराचर रूप धरे , पर भान नही तुमको कैसे ।
जो दृश्य अदृश्य रमे कण कण, श्रीराम हृदय मम बसते है ।
16
जड़ जंगम संगम स्वांस बसे ,धर रूप अदृश्य सनातन है ।
कलि काल अकाल सकाल सदा पर आदि अनादि पुरातन है ।
मन-हाथ चरण धन-ध्यान लगा, श्रीराम हृदय तट मे बिहरें ।
बिन स्वार्थ बढ़ो तज भौतिकता,बड़ भाग्य सुभाग मिलातन है ।
17
मिलन का आ गया अपने पुनः त्योहार आँगन मे ।
मिटा नफ़रत गले मिलकर करेंगें प्यार आँगन मे ।
न कुंठित मन मगन उर मे कहीं दुर्भावना पनपे ।
भरेंगें रंग खुशियों का सभी के द्वार आँगन मे ।
18
आप जाओगे चले तो मयकदा रह जाएगा ।
अश्क़ से भींगा हुआ ये आइना रह जाएगा ।
अश्क़ की बौछार होगी जब तेरी तस्वीर पर ।
काँच के टुकड़ों के दरम्यां दिल पड़ा रह जाएगा
19
आज धरा पर फ़ैल रहा क्यों हृदय में प्रदूषण है ।
हरियाली बन बाग़ बगीचों तक कैसा ये शोषण है ।
इन्हें बचना हे नर दानव वृक्षो की रखवाली कर ।
खग पंछी द्विज विहग नभो तक प्रकृति के आभूषण है ।
20
इक घरौंदा प्यार का बेशक़ बना आये हो तुम ।
आग सच की वाकई मे जो लगा आये हो तुम ।
बुझ गया होगा यक़ीनन ज़लज़ले तूफ़ान मे ।
एक दीया जो अँधेरे मे जला आये हो तुम ।
रकमिश सुल्तानपुरी
आगे मुक्तक भाग 5 में पढ़े –
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