1. कविता।फिर नया साल ।
फिर नया साल
पल्लवित होंगी झूठी आशाएँ
सस्ती शुभकामनायें
कुछ आधी-अधूरी यादें
कुछ दूर हुए है रिस्ते
धूमिल होता वो प्यार
पगडण्डी के उस पार
भरोशा किसका?
बदल गयी प्रथाएँ
हृदय व्यथा उपजाये
सम्बन्धों में इठलाती दूरी
अब दुःखों की होगी अदला-बदली
वो नये नये उपहार
पगडण्डी के उस पार
चलो खरीदें आंसू
हृदय हुआ जा रहा बंजर
फिर नही मिलेगा अवसर
अंकुरित करनी होगी भावनाएं
इंद्रधनुषी कुछ रूप सलोने
फिर लौटायेंगे उपहार
पगडण्डी के उस पार
**
2-फिर सहमा किसान
फिर सहमा किसान
नीलगायों के झुंड करे रखवाली
फसलों की बारी बारी
गाय, बैल का तांता
हल्लाबोल करे मनमानी
शहर से दूर
धूमिल अट्टहास भरपूर
सूखे बाढ़ की मार
पगडण्डी के उस पार
चलो दिखायें
निराशाओं के फूल
गेहूँ सरसों फाँके धूल
महँगाई फिर उकड़ूँ बैठी
हँसे समय बलवान
खाद बीज के दाम
वसूले किस्मत
अथवा अंधी सरकार
पगडण्डी के उस पार
दो दिन बाद
कमर तोड़ महँगाई
मुँहबाये, इठलाई
बेसुध पड़ा अमीर नीर हैं किसके
पीर न जाने वो
जिसके पग न फ़टे बेवाई
होगी कितनी दुखदायी
फिर होगी हाहाकार
पगडण्डी के उस पार
***
3–आज जलेंगे दीप
आज जलेंगे दीप
जलाना तुम भी
वर्षों बाद नयी उम्मीदें
तोड़कर स्वप्निल नींदें
देखो वह दूर झरोखा
अलसाई चिमनी की चीत्कार ।
पगडण्डी के उस पार ।
डरा ग़रीब
फिर आयी दीवाली
धन तेरस पर टूटा बर्तन
जलाता आंसूं , निज तन
करे पेट की पूजा
ढोता वृद्धापन का भार
पगडण्डी के उस पार ।
चलो दिखायें
जलते है दीप सलोने
महलों के कोने कोने
ख़ून के तेल ,स्वांस की बाती
झरोखे झिलमिल
बासी रोटी का त्योहार
पगडण्डी के उस पार ।
***
4–बना फकीर
सुनो दहाड़
गरजे सिंह ,है जनता मौन
छुपा हुआ है कौन ?
बताते उसको दोषी ?
लुट रहे सजग लुटेरे
दुबके है खूँखार ।
पगडंडी के उस पार ।।1।।
बना फ़क़ीर
जन जन का रखवाला
छप्पन इंची सीने वाला
डगमग नाव का केवट
भृष्टाचारी जलधारा पर
ले चलता जर्जर पतवार ।।
पगडंडी के उस पार ।।2।।
देश भक्त है
योगपुरुष बन करता नवनिर्माण
रचता स्वमसिद्ध प्रमाण
विरोधी मूर्छित
विश्व करे यशगान
दुश्मन को देता दुत्कार ।।
पगडंडी के उस पार।।3।।
***
5–लालच इनका एक ईमान
लालच इनका एक ईमान
हर पद का करते है मोल
खोल रहे है देश की पोल
फेंकते सुर्ख़ियो के पांसे
चलते शकुनी चाल
छिपे वेश में है गद्दार ।
पगडण्डी के उस पार ।
वही धर्म के नेता
पहन टहलते मायाजाल
है कालों के काल ,महाकाल
धर्मान्धता की भस्म
बाटते अचूक प्रसाद
करते मिले देह व्यापार ।
पगडण्डी के उस पार ।।
लगी हुई है आग
बताओ बुझेगी कैसे
मचा है हाहाकार कि पैसे पैसे
आखिर पकड़ कर अँगुली
कब तक किसे दिखायें
खुलेआम है भ्रष्टाचार ।
पगडण्डी के उस पार ।।
***
6–यादों का संसार
अनजाने रिस्तों की डोर
बाँध रही दृदय विशाल
मन को भी हरहाल
ठहरा है दूर पास का चेहरा
मात्र भावों का सम्बन्ध
शेष बचा आधार ।
पगडण्डी के उस पार ।।
निगाहों पर अवरोध
बोध हो कब तक ?
खुली आँख हों जब तक
स्वप्नों के दरवाज़े
झांकने जाती आह
बसा यादों का संसार ।
पगडण्डी के उस पार ।।
दोगला हुआ समाज
नियमों के थोथे बन्धन
बांध सके क्या मन ?
करे कुटिल निर्माण
मिलन में बाधक
करे प्रेम उल्लंधन
तन,मन पर प्रहार ।
पगडण्डी के उस पार ।।
7–होली आयी
होली आयी डरा गरीब
पखवारे भर का दाम
बस एक रात की शाम
उम्मीद लगाते बच्चे
किस्मत बेले पापड़
सहता त्योहारों का भार ।
पगडण्डी के उस पार ।।
चलो दिखाएँ खुशियाँ
पनपाती दुःख रूपी व्याज
ब्यवहरो में लाज
समाज झांकता चूल्हा
सस्ते व्यंग्यों के वाण
निर्धनता के अनुसार ।
पगडण्डी के उस पार ।।
सब रंग दिखे दो रंग
फ़बते गजब अजीब
अमीर और गरीब
काला और सफेद
बदरंग करें हुड़दंग ,दूसरा बेबस ,
सहता किस्मत की मार ।
पगडण्डी के उस पार ।।
8–मेरा भी अधिकार
आशाओं के फूल
पनपते मन की डाली
मैं-मैं,तू-तू की रखवाली
अथक प्रयासों में तल्लीन
सहता मानव मनमार
आरक्षण की मार ।
पगडण्डी के उस पार ।
जनमत की आवाज़
करे वोट निर्माण बचाये कुर्सी
बबूल के खुद पेड़ बताते तुलसी
पतझड़ सी झड़ती आशाये
बचा रह गया ठूठ
हारा,थका और लाचार ।
पगडण्डी के उस पार
आई होली उड़े गुलाल
कितने चेहरे है बदरंग
मानवता का फ़ीका रंग
राजनीति में हड़कम्प
चेहरा लगे छुपाने
चद्दर ओढे पड़े बीमार ।
पगडण्डी के उस पार ।
***
9–वही इंसान ।
वही इंसान
सभ्यता की दे रहा दलीलें
ह्रदय प्रेम बस सूखी झीलें
झलकाता सम्मान
है पैसों का भूखा
करता भावो तक व्यापार ।
पगडण्डी के उस पार ।
वाणी सूक्ति प्रवाह
मन में शोषण के अंकुर
पैगम्बर छणभंगुर
जहरीला ज्ञान
बताते कैसे ?
थोथा जीवन निम्न विचार ।
पगडण्डी के उस पार ।
सम्बन्धो के धागें
हुये जीर्ण तो बने अटूट
पर पैसे की लूट
बनाती रिस्ते जर्जर
व्यवहारों में बदलाव
शोषण का अधिकार ।
पगडण्डी के उस पार ।।
****
10–। कुछ दूरी के रिस्ते ।
कुछ दूरी के रिश्ते
संदेहों के कदमों से आते
चलते,रुकते ,गिरते, डगमगाते
जाने -पहचाने भावों से
उन अनजानी राहों पर
ढूढ़ रहे अधिकार
पगडण्डी के उस पार
भला बताओ कैसे जाता ?
मैं ख्वाबो में, सच्चाई से दूर कही
कुछ रिस्ते मंजूर नही
पगडण्डी के पास खड़ा मैं
यादों के सजें झरोखें है
तस्वीरों से बरसे प्यार
पगडण्डी के उस पार
ठहरो ,मत आओ नजदीक
और झूठ मत होने देना
सच की आशाये मत खोने देना
न रूप तुम्हारा आहत होगा
होगा प्यार न झूठा
है अलग तेरा संसार
पगडण्डी के उस पार
***
11– यह कैसा प्रेमजाल ?
यह कैसा प्रेमजाल ?
खिली मधुर मुस्कान
स्मृतियां,मन,गाते तन-गान
आह्लादित है प्रसून वह चेहरा
अरे! भावनाओं की ओट
शिकारी बना शिकार
पगडण्डी के उस पार
झूठे प्रलोभन झूठा अनुमान
प्रेमी खेलता खेल
भावनाओं से मेल,बेमेल
सहनशीलता की अवनत आँखे
तकटकिओ की धार ,बौछार
होने लगा देह व्यापार
पगडण्डी के उस पार
चलो गाये प्रेम गीत
भरे दर्द में दुःख की आहें
कंटकांकुरित दूर जटिल है राहें
सहता कौन ? पवित्रता मौन
विचलित डिगा ईमान मान,सम्मान
फिर हुआ कुकृत्य ,संहार
पगडण्डी के उस पार
***
12– पूस की रात
पूस की रात
निशा भरे खर्राटे
बनकर पहरेदार सुने सन्नाटे
कुहरे धुंध की आहट धीरे-धीरे
झुरमुट से चलती कछुआ चाल
हाड़ कपाती ठण्ड कुटिल व्यवहार
पगडण्डी के उस पार ।।
झोपड़ी में सोता वृद्ध
ठिठुरा अलाव,ठण्ड ; तो कैसे?
जर्जर कम्बल जैसे तैसे
टुकुर-टुकुर करती वे आँखे
देख थरथराती वो खाट
फिर से चलने लगी बयार
पगडण्डी के उस पार ।।
सिहरें तन,तन रोम, देखता व्योम
अलसायी रात बदलती करवट
कुहरा हुआ जवान अभी तो तिरसठ
सुन मुर्गे की बाग़ डरा सन्नाटा
कुहरे संग धुंध ,कुहासा ,ओले
छोड़ते निरीहता पर प्रहार
पगडण्डी के उस पार ।।
***
13–भूखा मानव करे अलाप
भूखा मानव करे अलाप
वह भूख नही पर आज
भोजन बना समाज
धन ,वैभव की होड़ ,गठजोड़
सम्बन्धों में घात
छद्मवेश में दहता रहता
पगडण्डी के उस पार ।।
मानवता के अंकुरण
भौतिकता में दबी सभ्यता
प्रगति की नव्यता
काट रह है फसल दुःखों की
भरा हृदय भण्डार
कुचल गयी सज्जनता
पगडण्डी के उस पार ।।
अहंकार के वृक्ष फले है लोभ
अधपकी कलुषता पकती कैसे
शाखाएं तो मन में;झुकती कैसे ?
कुछ एक डालियां टूटी
फूटते नये अंकुरण
भुखमरी के हुए शिकार
पगडण्डी के उस पार ।।
**
14 –पगडंडी के उस पार
आज सघन कुहरे में
एकाकी झोपडी , एक घरौंदा
ओझल, गरीबता में रौंदा
फिर ढक गया दुःखों से
सूरज तो निकाला था
धूप भी फैली थी
पगडण्डी के उस पार
भाग्य खेलता खेल
और बचपन भी
कोमल अल्हड़पन भी
ठिठुर रही थी ठण्डक
जले अलावे ,जले पुआल
तपता जीवन
पगडण्डी के उस पार
माँ बर्तन के पास
धो रही आंसू
कटकटाता दाँत
दुकान के चावल का घुन
कुत्ता सहलाता बासी भात
बच्चों को तोड़नी लकड़ी
पगडण्डी के उस पार
By–रकमिश सुल्तानपुरी
समस्त कविताएं Rakmish Sultanpuri के द्वारा रचित एवम प्रकाशित है ।
________________________________________
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें