रकमिश सुल्तानपुरी की 4 बेहतरीन कविताएं

रकमिश सुल्तानपुरी की 4 कविताएं 

1–
आओ चलें
एक सफ़ऱ पर ,तनहाइयों से दूर
क्या तुम चलोगे
शहर की सरहदों के उस पार
वक़्त ? वक़्त मेरे पास भी नही
उफ़ !ये जीवन की रफ्तार
आराम कर लो
ख़ुद को खुद मे झाँकने का मौका तो दो
अतीत की यादें धूमिलता से चीखती है
अब छोड़ दो ये झूठी शान
अपनेपन की नादानी
चलो परिणाम के छोर के भी आगे
सन्नाटे की व्यथा से दूर
खामोशियों तो बदलाव नही लाती
तमाम सभ्यताओं के खंडहर
और तुम
ज्यादा मत सोचो
आओ चलो दिखाएँ
भविष्य के  दर्पण मे कुचली सुन्दरताएँ
ये अठखेलियां ,नादानियां
छोड़ दो
आओ तो जरा मिलकर बीनें
आनन्द के फूल
भौतिकता की भवँर से दूर
भावनाओं की लहरों पर
वहाँ देखो तो
पगडंडियां बुला रही है
एक नए जीवन के लिए
कहाँ है आपके क़दम ?
ये कपकपी अच्छी नही 
पर मुझे जाना ही होगा
यादों के तारामंडल मे खोजने
खुद से
खुद का अस्तित्व

******** 

2–

कौन बनाता है मन को
इतना चंचल
जब चाहे जहां चाहे
चला जाता है
अपनी पसंद के फूल से
चेहरे पर
भौरों सा करता गुंजन
पल दो पल ।।

कौन देता है रोशनी
दृगों को
जो मन को ढूढ़ते ही
जा पहुँचती है
अचानक
उद्यान के खुशबू का
उद्गार देखने
हो जाता है तृप्त ।।

कौन नियंत्रित करता है
यादों को
जो आ जाती है
अचानक
मेहमानों की तरह
मन में प्रवेश कर
हृदय को कर देती है
विच्छिन्न ।। 

कौन बनाता है हृदय
इतना कोमल
जो जरा से स्नेह से
पिघल जाता हैं
स्मृतिओं से करके दोस्ती
दर्द पाता है
सह जाता है
पर रुकता नही पिघलाव ।।

कौन दिखाता है स्वप्न
जो नींदों को
बनाता सुखमय
मन और दृगों को करता आकर्षित
प्रेम के तूफान को
दिखाता सीमा के पार
कर देता है बेचैन ।। 

     
                
3–
   (1)कविता।मन एक दर्पण है।

मन एक दर्पण है
मन का
भावनाओ की छाया
यादें बनकर
आहटों की तरह
प्रतिबिम्बित होती है
मन में
देखता है दृग ।।

मन एक दर्पण है
दिल का
अपने ही उर में
अपनी तस्वीर नही
हृदय व्याकुल है जिसके लिये
झिलमिलाता है वह चित्र
तन का स्पस्ट ।।

मन एक दर्पण है
ज्ञान का
रहस्य प्रकट कर देता है
तन का नही
हृदय की तस्वीर का
धुँधली है दर्पण में
खुद की तस्वीर क्यों
स्वयं क्यों ?।

मन एक दर्पण है
भावों का
अव्यक्त विचारों पर
करता विचरण
देखने का माध्यम
स्वयं की उपस्थिति
अप्रत्यक्ष रूप से
नेत्र में नेत्र ही ।।

मन एक दर्पण है
प्रेम का
भावों को प्रकट कर
लक्ष्य को दिखा देता है
दृगों को
कितनी गहरी पड़ी है छाप
और कितना है
आकर्षण में स्नेह ।।

           
4–
कविता।वृक्ष बबूल।


निर्झरणी बही
और ह्रदय के भाव
छाये भावनामयी बादल
राग रंग भर साज
डूबे भाव में भाव
महकी खुसबू तब खिले फूल ।

गीतों के संग गीत
कम्पित होठ
मिलाते धुन धूमिल भाव
रचते दृश्य अपरिचित 
खुला हृदय अध्याय
जागी आत्मीयता तब मिटे शूल 

कविता पाठ
काश! मैं भी सुनता
हृदय के गीत
कल्पना की शक्ति
रच देता हरियाली का भाव
देख कोई भी ठूठ तब वृक्ष बबूल 

                          @रकमिश सुलतानपुरी 

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