31- 🌷ताकी पड़े न फिर पछताना🌷
आवश्यक है इस जीवन मे जीने की परछायी
परन्तु यक़ीनन हो न पाती त्रुटियों की भरपायी
इसीलिये पथ
चाहे जो हो
बिना विचारे मत बढ़ जाना ।
ताकी पड़े न फिर पछताना ।।1
अवलम्बन चाहे जैसा हो कभी न देना छोड़
प्रलोभन से भरा पड़ा है जीवन का हर मोड़
असफलताओं
के काँटों को ।
फूल समझ कर तुम सह जाना ।
ताकी पड़े न फिर पछताना ।।2
यहाँ रास्ते बहुरुपिया हैं पथिकों को भरमाते
भटक गये हैं जो मंजिल से पता नही वो पाते
पगड़न्ड़ी जो
मिले उसी पर
धीरे ही पर चलते जाना ।
ताकी पड़े न फिर पछताना ।।3
स्नेहों के लिये कभी क्या अनुमति माँगी जाती
और हृदय की अन्य लालशा पूरी क्या हो पाती
फिर भी कोशिश
करके देखो
हृदय न कभी दुखाना ।
ताकी पड़े न फिर पछताना ।।4
तथा उम्र का क्षणभर भी तो लौट पुनः न आये
घटनायें कुछ स्मृतियाँ ही बचती यहाँ बचाये
इस जीवन मे
शेष सभी कुछ
इक न इक दिन है मिट जाना ।
ताकी पड़े न फिर पछताना ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
32- 🌷नही मिल सकी राहत🌷
अनुभव करके देख लिया हूं स्नेहों का भार
बिफल रहा है हृदय मेरा कोशिश के अनुसार
न्योछावर
करना पड़ता है
तन की मन की चाहत ।
नही मिल सकी राहत ।।1
आशाओं पर,आश्वासन पर आगे बढ़ते जाते
प्रेमपथों पर धीरे -धीरे निरालम्ब हो आते
ठहरावों पर
बढ़ती जाती
तन -मन में घबराहट ।
नही मिल सकी राहत ।।2
शायद कोई मिल भी जाता परन्तु उसे है जाना
कुछ पल तक तो साथ रहा फिर करने लगा बहाना
दूर दूर तक
फिर न मिलती
आने भर की आहट ।
नही मिल सकी राहत ।।3
अवनत मन से अनमन होकर चला नही है जाता
एक बार बिछड़े जीवन से पता कौन है पाता
स्नेहों में
आकर्षण की
ठहर सकी न आगत ।
नही मिल सकी राहत ।।4
तभी आज मै बिछड़ गया हूं पगड़न्ड़ी को पाये
चले गये हमराही अपने , पाकर अपने शाये
देखो कब तक
इस हृदय में
भावों की रुकती अवगाहत ।
नही मिल सकी राहत ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
33- 🌷शायद मिल पाती इक राह🌷
अब तो जब तब देख रहा हूँ नयनों की बदमासी
चुपके चुपके निरख रही हैं आँखें प्यासी-प्यासी
क्योंकि उसने
मूक भाव से
छीन लिया हृदय की आह ।
शायद मिल पाती इक राह ।।1
धीरे- धीरे चला जा रहा थोड़ा सा सकुचाते
थोड़ी दूर पहुँच करके फिर मन ही मन पछताते
विस्मृत करके
सारी अड़चन
बढ़ने की बढ़ जाती चाह ।
शायद मिल पाती इक राह ।।2
संकेतों से उनके मन पर करता हूँ प्रहार
आहत होते रुक जाता हूं पाने का अधिकार
न जाने क्यों
नही मानती
फिर से बेबस हुई निगाह ।
शायद मिल पाती इक राह ।।3
पनप गया है अनजाने मे स्नेहों का अंकुर
मुर्झायेगा जान रहा हूं वे है कितने निष्ठुर
पलकों की
छाया से लेकिन
करता हूं उनको आगाह ।
शायद मिल पाती इक राह ।।4
आज नही पर और किसी दिन हो उनको अहसास
बिफल हुआ तो हो जाने दो मेरा यह प्रयास
ऐसे कितने
प्रेम हृदय का
होता रहा निबाह ।
शायद मिल पाती इक राह ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
34- 🌷जर्जर है जिसका आधार 🌷
त्याग किया जिसने जीवन का बिना किये आराम
निश्चित उसने ही पाया है कर्मो का परिणाम
बाकी सब तो
सोच सोचकर
तर्कों का करते बौछार ।
जर्जर है जिसका आधार ।।1
बात बदलते हैं जैसे कि कोई हवा बदलती
और पुष्टि के लिये दुबारा कर जाते है गलती
फिर भी रहते
अडिग उसी पर
नही बदलता है व्यवहार ।
जर्जर है जिसका आधार ।।2
अपनेपन से चले जा रहे आशाओं के पीछे
बहुत दूर है मंजिल फिर भी मान रहे नज़दीके
पता चला जब
सिर्फ निराशा
के बनने लगे आसार ।
जर्जर है जिसका आधार ।।3
मिल जातीं यदि बिना किये कुछ जीवन की वो राहें
इन पलकों से नही निकलतीं आँशू बनकर आहें
निर्झर सी न
झर पाती वे
प्रकृति के अनुसार ।
जर्जर है जिसका आधार ।।4
किया संतुलित मन है जिसने हृदय को समझाया
देर हुई पर स्वावलम्बन से लक्ष्य उसी ने पाया
शेष और सब
स्वयंसिद्ध है
संकुचित हो जाता विस्तार ।
जर्जर है जिसका आधार ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
35- 🌷हार गया मै भोलेलन से🌷
इठलातीं इक तितली सी तुम आ जाती हो पास
छाया बनकर रहना चाहे हृदय का प्रयास
पुनः दूर तुम
इन आँखों से
हो जाती हो धुँधलेपन से ।
हार गया मै भोलेपन से ।।1
चितवन व्याकुल कतराती है पाकर तेरी आहट
और अचानक पास देखकर बढ़ जाती घबराहट
क्षणभर नाता
जुड़ जाता है
नेहो के इस दुहरे पन से ।
हार गया मै भोलेपन से ।।2
चंचलता से , शीतलता से करती हो संकेत
स्वर्ग की आभा खिल जाती है मानो हृदय समेत
उस पल को
न जाने कब तक
खोजा करता अंधेपन से ।
हार गया मै भोलेपन से ।।3
खिल जातीं है वे मुस्कानें जैसे एक कली हो
शर्मीलापन छा जाता है जैसे शाम ढली हो
यही निगाहें
टिकी टिकी सी
स्पर्श कर रहीं अपनेपन से ।
हार गया मै भोलेपन से ।।4
छोटी छोटी सी बातों पर तेरा वह मुस्काना
स्मृतियाँ है और नही कुछ बचा है ताना बाना
मै भी तो अब
खीझ गया हूँ
इस हृदय के छिछलेपन से ।
हार गया मै भोलेपन से ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
36- 🌷भूल गया उसका परिणाम🌷
वही रास्ते जो कदमों के थे बिल्कुल नजदीक
आज दूर है इन आँखों से बाकी सबकुछ ठीक
समझ न पाया
भौतिकता में
करता रहा आराम ।
भूल गया उसका परिणाम ।।1
साहस करके किसी तरह से चलने की जब ठानी
हृदय साथ था पर चँचल मन करता आनाकानी
अनबन हो गया
अपने मन से
आखिर मै निकला नाकाम ।
भूल गया उसका परिणाम ।।2
वर्षो तक चलते चलते इक पगड़न्ड़ी थी पायी
वही रुक गया सोंचा मंजिल स्वयं चली है आयी
उठ बैठा जब
देखा मैंने
कुछ मिला नही अंजाम ।
भूल गया उसका परिणाम ।।3
फिर लगातार अनवरत अनन्तर ढूढ़ रहा हूँ छाया
उसी राह पर जहा से आया पहुँच अभी न पाया
न जाने
किसके हृदय पर
लिखा है किसका नाम ।
भूल गया उसका परिणाम ।।4
सिर्फ याद हैं कुछ घटनायें जो दिल से टकरायी
तन्हा राहे तरसाती है तन की वह तन्हाई
और तभी तो
सह पाता मन
छिपा हुआ इंतक़ाम ।
भूल गया उसका परिणाम ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
37- 🌷कुछ पल तक बगदाती 🌷
न जाने क्यों आ जाती है नीदें भी अब धोखे से
लगतीं है फिर पुनः झाँकने हृदय के एक झरोंखे से
अनहोनी
हृदय स्पर्शी
घटनाएँ मुस्काती ।
कुछ पल तक बगदाती ।।1
दो इक दिन से स्वप्न नही अब रातों में आ पाते
स्वप्नों के स्मृतियों के पल ही पलकों पर आ जाते
बाक़ी सब कुछ
और विभावरि
भी मुझसे छिप जाती ।
कुछ पल तक बगदाती ।।2।
दिन भर तो भौतिकता मे रहता है भटका मन
पुनः शाम को झिलमिल सी आ जाती है एक किरन
सिर्फ तुम्हारे
ही चेहरे की
छाया है भरमाती ।
कुछ पल तक बगदाती ।।3
इस आशा से कि निश्चय ही आज मिलेगी आहट
बढ़ती जाती देख निशा को हृदय की घबराहट
और किसी दिन
फिर स्वप्नों मे
दूर खङी इठलातीं ।
कुछ पल तक बगदाती ।।4
बिखर गये सारे सपने वे यादों को दोहराकर
इक तितली सी उड़ जाती हो हृदय को सहलाकर
काश! हमारे
उर की आँखे
साथ साथ उड़ जाती ।
कुछ पल तक बगदाती ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
38- 🌷उनको कैसे हो विश्वास🌷
आवेशित भावों पर जिसने किया नही अधिकार
कैसे पाता पता हृदय का स्नेहिल संचार
आगे बढ़कर
छोड़ चुके जो
जीवन का एहसास ।
उनको कैसे हो विश्वास ।।1
कि जीवन यह सिर्फ सफलता पाना नही सिखाता
किया गया संघर्ष हर्ष का एक स्रोत बन जाता
फिर तो सबने
जान लिया है
हो जाता है सबका ह्रास ।
उनको कैसे हो विश्वास ।।2
कितना क्यों न पहन चुके हो वे पुष्पों की माला
बरसातों से उन धूपों से पड़ा नही पर पाला
एक अंकुरित
पुष्प सुगन्धित
क्या बन जाता अनायास ?
उनको कैसे हो विश्वास ।।3
अनायास ही स्नेहों के आँशू न बन पाते
जब हृदय होता है द्रवित पलकों पर छा जाते
अनुरागों का
बिम्ब सलोना
साँसों में भरता उच्छ्वास ।
उनको कैसे हो विश्वास ।।4
क्योकि उसने निज भावों को कभी नही उकसाया
भौतिक भावों की भौतिकता से मन को नहलाया
और तभी तो
निज हृदय का
कर देते है सत्यानाश
उनको कैसे हो विश्वास ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
40- 🌷इक न इक दिन पछताओगे🌷
इन आँखों के उद्देश्यों पर है तेरी तस्वीर
स्नेहों की पनप रही है धुँधली एक लकीर
जान रहा हूं
किसी और के
हृदय में तुम बस जाओगे ।।
इक न इक दिन पछताओगे ।।1।।
न जाने क्यों सिर्फ तुम्ही पर है नयनों को आहट
अनदेखा कर देख तुम्ही को मिल जाती है राहत
मेरी हालत
जान रहे पर
व्यथा कहूं तो हँस जाओगे ।
इक न इक दिन पछताओगे ।।2
अवसर पाकर अपलक नयनों से नेहों का वर्षण
जितना होता बढ़ता जाता हृदय का आकर्षण
सच तो यह है
जहाँ रहोगे
स्नेहों को उमड़ाओगे ।
इक न इक दिन पछताओगे ।।3
साहस होता तो कह देता हृदय की हर बात
मै चातक सा आशातीत तुम स्वाती की बरसात
यहां नही तो
और कही पर
निश्चित ही तुम बरसाओगे ।
इक न इक दिन पछताओगे ।।4
यह सुंदरता यह आकर्षण प्रकृति के अनुसार
भौतिवादी यह मेरा मन चाह रहा उपहार
दो ही बातें
हृदय स्पर्शी
कहने से क्या कतराओगे ?।
इक न इक दिन पछताओगे ।।5।।
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
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