41- 🌷कौन कहा तक हारा🌷
सच तो यह है कि सच्चाई आहट भर ही आती
सन्नाटा है झूठेपन का मिलते ही खो जाती
और करे क्या
यह जीवन तो
उसको भी है प्यारा ।
कौन कहाँ तक हारा ।।1।।
बिबस हुये जो ढल जाते है जैसे चली हवाएँ
और रुके जो स्पंदित हो अब तक सम्हल न पायें
बढ़ता ही
जाता रहता है
प्रगति का फौव्वारा ।।
कौन कहाँ तक हारा ।।2।।
प्रतिस्पर्धा की आँधी मे हित अनहित क्या होता
सफल हुआ है केवल वह जो कुछ न कुछ है खोता
कभी कभी तो
कम पड़ जाता
अपना जीवन सारा ।।
कौन कहाँ तक हारा ।।3।।
आश्वाशन पर चलकर जिसने कीमत है न जानी
वक्त गया फिर भी जीवन की न बन सकी कहानी
अवलम्बित
बढ़ता जाता है
लिये दुखों को सारा ।।
कौन कहाँ तक हारा ।।4।।
जीत सका न इस जीवन से कोई भी इक रेस
तभी हृदय यह देता रहता जीने का संदेश
इक न इक दिन
परन्तु सभी को
कर्मो के अनुसारा ।।
कौन कहाँ तक हारा ।।5।।
और अंत में घटनाएँ ही करती है संकेत
यांदे भी देती तकलीफें जीवन सकल समेत
कुछ भी करना
मानवता से
करना नही किनारा ।।
कौन कहाँ तक हारा ।।6।।
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
42- 🌷जीवन जीने का अभ्यास 🌷
क्योंकि तुमने असफलता का पाया है परिणाम
इसीलिए धूमिल आशायें लेती है इंतक़ाम
फिर क्या तुमने
सोच लिया है
नही करोगे अब प्रयास ?
जीवन जीने का अभ्यास ।।1
कभी कभी तो तर्को से ही मिल जाते उद्देश्य
और कभी तो इस जीवन में भर जाता है द्वेष
जिसके चलते
तन की मन की
रह जाती है प्यास ।
जीवन जीने का अभ्यास ।।2
मंजिल एक सभी की होती राहें है अंजान
बड़ी मुश्किलों से ही कोई बन पाता इंसान
और तभी तक
मानवता का
होता है एहसास ।
जीवन जीने का अभ्यास ।।3
मान रहा हूं होती है सबको चाहत धन की
परन्तु लालशा बढ़ती जाती धन के अंधेपन की
कुछ न कुछ तो
करना ही है
ताकी जारी रहे तलाश ।
जीवन जीने का अभ्यास ।।4
बड़ी मुश्किलों से ही कोई पाता है मुस्कान
वरना सबके सब ही जग मे पा जाते सम्मान
निज कर्मो से
सत्कर्मो तक
कर्तव्यों का होता ह्रास ।
जीवन जीने का अभ्यास ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
43- 🌷कितना भी मै थक जाऊँगा🌷
चुप हूं ताकि समझ सको कुछ संकेतों के भाव
और नही कुछ इन आँखों में थोड़ा सा प्रभाव
देख सको तो
हृदयकुंज में
कोशिश करके रख जाऊँगा ।
कितना भी मै तक जाऊँगा ।।1
उचित रहेगा क्योंकि तुमने सोच लिया अंजाम
और फासलें कम न होगें हम होंगें बदनाम
फिर भी चाहे
कहकर देखो
पलभर पर मै रुक जाऊँगा ।
कितना भी मै तक जाऊँगा ।।2
स्नेहों में कभी न पूछो यादों की फ़र्माइश
शेष नही है थोड़ी सी भी खुशियों की गुंजाइश
पर ढूढ़ ढूढ़कर
खुशियाँ सारी
यादों तक मै ढक जाऊँगा ।
कितना भी मै तक जाऊँगा ।।3
चलो कभी तो अंजाने में होगी इक मुलाकात
अपनापन तो नही रहेगा फिर भी होगी बात
और वहाँ भी
चेहरा तेरा
एक झलक भर लख जाऊँगा ।
कितना भी मै तक जाऊँगा ।।4
इक न इक दिन तुम आओगें निश्चित मेरे पास
हो सकता तब बदल गया हो हृदय का एहसास
फिर भी तुमको
हृदय कुन्ज मे
रख करके मै समझाऊंगा ।
कितना भी मै तक जाऊँगा ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
44- 🌷रात बीत ही जाती🌷
संकेतों के प्रतिबिम्बों पर मेरा अनुसंधान
पूर्ण नही होता हृदय पर बिफल रहा अनुमान
फिर भी तेरी
मुस्काने वे
भाव सही दर्शाती ।
रात बीत ही जाती ।।1
कोरे कोरे स्वप्नों में जब खिल जाती मुस्कानें
तब भावों के अवलम्बन से लगती हैं बहलाने
वही आवाजें
गूँज रहीं है
हृदय तक दहलाती ।
रात बीत ही जाती ।।2
जान रहा हूँ अनजाने मे जुड़ जाता है नाता
पर इस पावन हृदयप्रेम का पता कौन है पाता
जिसमे तुम हो
और तुम्ही को
पता नही चल पाती ।
रात बीत ही जाती ।।3।।
सहज रूप से यह हृदय जो सोच रहा सच होता
उसे पता क्या प्रेम अंकुरण अनजाने में बोता
भावों के इन
प्रभावों में
स्मृतियाँ रह जाती ।
रात बीत ही जाती ।।4।।
कैसे कह दूँ फिर तकलीफें करती हैं प्रयास
खुले नयन फिर भी नींदों का करते है अभ्यास
सम्मोहन की
एक झलक भर
क्या फिर से मिल पाती ।
रात बीत ही जाती ।।
पुनः अखरती आँखों से स्मृतियों तक जाता
फिर तो तेरी परछायी तक पकड़ नही मै पाता
अभावों की
तारतम्यता
बंध करके धुमिलाती ।।
रात बीत ही जाती ।। 6।।
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
45- 🌷स्नेहों का यह प्रभाव🌷
न जाने कितने रूपों की व्याख्याएँ कर डाली
परन्तु आज आवाक नयन है भाव है खाली खाली
रुका हुआ है
संकेतों पर
बना हुआ है यह ठहराव ।
स्नेहों का यह प्रभाव ।।1
निर्मल मन पर रूप सलोना करता है अधिकार
अनायास ही इस हृदय पर बढ़ जाता है भार
स्मृतियों में
आकरके वह
जोड़ रहा स्नेहिल भाव ।
स्नेहों का यह प्रभाव ।।2
सिर्फ भाव से नही हो सकी यादों की भरपायी
पर स्मृतियां ही बन जाती रूपों की परछायी
संकेतों से
फिर हृदय पर
कर जाती है गहरा घाव ।
स्नेहों का यह प्रभाव ।।3
रूप तुम्हारा किसी रूप में परिवर्तित हो आता
भावों के अविरल प्रभाव से यह हृदय भर जाता
फिर तो कुछ भी
सोंच सके न
कर ही सकता क्या वर्ताव ।
स्नेहों का यह प्रभाव ।।4
इन आँखों ने छायाओं का अवलम्बन भर पाया
और उसी से इस हृदय पर अंधकार सा छाया
प्रयासों की
एक किरण से
मिट जायेगा यह अलगाव ।
स्नेहों का यह प्रभाव ।।5
by✍रकमिश सुल्तानपुरी
46- 🌷चाहे जो भी हो अनुमान🌷
किसने कब तक मुर्झाते फ़ूलों की माला गूँथी
किसकी जीवन में जीवन भर बोल रही है तूती
धीरे धीरे
परन्तु एक दिन
मिल जाता सबका परिणाम ।
चाहे जो भी हो अनुमान ।।1
जिसने भी सत्कर्मो की नाव नही दौड़ाया
निर्बल और निरीहों पर दया नही दिखलाया
कभी किसी दिन
असहायों सा
भटकेगा निश्चित हैरान ।
चाहे जो भी हो अनुमान ।।2।
सिर्फ मंजिले ही तय करना जीवन नही सिखाता
कौन रास्ता मानवता का है मंजिल तक जाता
यही सोचकर
जो बढ़ता है
जीवन हो जाता आसान ।
चाहे जो भी हो अनुमान ।। 3
तथा स्वार्थ की प्रबल भावना में स्थिरता पाना
एक लक्ष्य हो इस जीवन का बस मानव बन जाना
जिसने भी यह
अपनाया है
नया करेगा अनुसन्धान ।
चाहे जो भी हो अनुमान ।। 4
और कभी भी अभिमानो से मान नही बढ़ पाया
कोशिश चाहे जिसने भी की हार मिली मुर्झाया
इस जीवन में
इक ही दिन पर
बनकर देखो तुम इंसान ।
चाहे जो भी हो अनुमान ।। 5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
47- 🌷आँशू होते तो बह जाते🌷
मान रहा हूं कि दुविधाएं परख रही है धैर्य
फिर क्या पाल सकोगे मन में कर्तव्यों से बैर
सम्भव होता
तो मुझसे फिर
वही वेदना क्यों बतलाते ।
आँसू होते तो बह जाते ।।1
इतने दिन तक सतपथ पर जब हुआ नही अफ़सोस
भाग्य किसी का दूर हटे फिर किसमे किसका दोष
क्या लौटोगे
या रुकते हो
और दुखों को पाते ।
आँसू होते तो बह जाते ।।2
मत झांको इस जीवन में हर जीवन इक झांकी
सिर्फ झरोंखे सच्चाई के और नही कुछ बाकी
भावों के वे
निर्भय सम्बल
लिये सभी बढ़ पाते ।
आँसू होते तो बह जाते ।।3
सही बात है वह जीवन जिसे छोड़ तुम आये
अंधकार है फिर भी लाखों झेल रहे मुसकाये
पुनः उसी में
जा करके क्या
उन जैसा बन पाते ।
आँसू होते तो बह जाते ।।4
यह हृदय की आह बनी है प्रकृति का उपहार
एक कशिश जो खींच रही है मानवता के पार
नही मिटेगी
यह जीवन भर
दबती नही दबाते ।
आँसू होते तो बह जाते ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
48- 🌷पुनः एक दिन अपने आप🌷
किसी तरह से इस हृदय मे सजो रहा हूं सांति
परन्तु कहाँ तक रुक पायेगी अकुशल मन की भ्रान्ति
धीरे धीरे
कभी अचानक
उभरेगी बनकर सन्ताप ।
पुनः एक दिन अपने आप ।।1
आशाओं की एक परिधि तक टिका रहा हर्षाय
बिस्वासों की डोर पकड़कर सम्हल रहा असहाय
तब भी मुझको
नही मिल सकी
पावन स्नेहों की छाप ।
पुनः एक दिन अपने आप ।।2
पड़ी मिलेगी बाधाएँ इस जीवन मे हरहाल ।
पार तुम्हे करना ही होगा विक्षोभों की जाल ।
साहस रखकर
एक रूप मे
पाना ही होगा प्रभात ।
पुनः एक दिन अपने आप ।।3
बचपन की वह स्वर्णिम आभा बचकानी किल्लोल
छूट गयी है दुर्विचार में बेसक वह अनमोल
बचा नही कुछ
बढ़ता जाता
आशाओं का मूक अलाप ।
पुनः एक दिन अपने आप ।।4
कोशिश करके भले बना लें अनुरागों की ढाल
इक न इक दिन फट जायेगी कृत्रिमता की झाल
निश्चित ही फिर
दुःखी करेगा
तन, मन, धन का पाप ।
पुनः एक दिन अपनेआप ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
49-. 🌷आख़िर मै कब तक समझता🌷
एक भरोसा शेष रह गया बन करके सन्ताप
टूट गया वह अपनापन भी जुड़कर अपनेआप
फिर भी दिनभर
स्मृतियों में
चित्र तुम्हारा आता ।
आखिर मै कब तक समझाता ।।1
जान रहा हूं इक न इक दिन टूटेगा विश्वास
फिर भी झूठे कर्तव्यों से करता हूं प्रयास
कहीं कहीं पर
अनजाने में
सत्य उभर ही आता ।
आखिर मै कब तक समझाता ।। 2
और स्वयं को आश्वासन भी देता हूँ हर बार
ताकि अंतिम सरस बन सके हृदय का व्यवहार
देख तुम्हारी
मनोभावना
कोई भी इठलाता ।
आखिर मै कब तक समझाता ।। 3
जाने दो यह बहुत बड़ी है सन्देहों की जाल
और सुनहरी आकर्षक लगती ढुलमुल चाल
तथा रात वह
निरा सावनी
चलना नही सुझाता ।
आखिर मै कब तक समझाता ।। 4
किसी वृत्त की जीवा सा जुड़ा हुआ अधिकार
किन्तु केंद्र तो दूर रह गया मिला नही आधार
लम्बार्धक
उस जीवा की
खींच कहाँ तक लाता ।।
आखिर मै कब तक समझाता ।। 5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
50-. 🌷तब मुझको मालुम हो जाता🌷
यह भृम मेरा कि तुम मुझसे काफी हो प्रभावित
स्मृतियों तक आता जाता कर देता है साबित
किसी रूप में
किसी रंग में
रूप तुम्हारा भाता ।
तब मुझको मालुम हो जाता ।।1
हृदय स्पर्शी भाव तुम्हारे होने का अहसास
कितना कोमल अपने पन का स्नेहिल विश्वास
अधिक नही
पर एक बार ही
मेरे प्रति मुस्काता ।
तब मुझको मालुम हो जाता ।।2
न जाने किन सत्कर्मों से आयें हम नजदीक
सम्प्रेषण इस सम्मोहन का आखिर कब तक ठीक
इक न इक दिन
बना बनाया
आकर्षण मिट जाता ।
तब मुझको मालुम हो जाता ।।3
सिर्फ नही तुम और सभी गहराई तक जाते
परन्तु हृदय आधारहीन पहुँच कहाँ वे पाते
बस थोड़ा सा
हलचल करके
पता कौन है पाता ।
तब मुझको मालुम हो जाता ।।4
यदि तुम भी आत्मनियंत्रण हृदय का खो देते
संकेतों से नेह बिंदु को नयनों मे भर देते
पुनः पुनः फिर
स्मृतियों से
पलकों पर उभराता ।
तब मुझको मालुम हो जाता ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
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